भगवान महावीर की मानव-निर्माण कला!
Akhand Gyan - Hindi|March 2021
मूर्तिकार ही अनगढ़ पत्थर को तराशकर उसमें से प्रतिमा को प्रकट कर सकता है। ठीक ऐसे ही, हर मनुष्य में प्रकाश स्वरूप परमात्मा विद्यमान है। पर उसे प्रकट करने के लिए परम कलाकार की आवश्यकता होती है। हर युग में इस कला को पूर्णता दी है, तत्समय के सद्गुरुओं ने!

हर पत्थर में मूर्ति विद्यमान रहती है। पर उसे अनावृत्त करने के लिए एक कुशल मूर्तिकार की आवश्यकता होती है। मूर्तिकार ही अनगढ़ पत्थर को तराशकर उसमें से प्रतिमा को प्रकट कर सकता है। ठीक ऐसे ही, हर मनुष्य में प्रकाश स्वरूप परमात्मा विद्यमान है। पर उसे प्रकट करने के लिए परम कलाकार की आवश्यकता होती है। हर युग में इस कला को पूर्णता दी है, तत्समय के सद्गुरुओं ने! ईसा पूर्व 599 की चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को अवतरित हुए जैन मत के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर। वे भी इस परम कला में निष्णात थे। उन्होंने अनेक मनुष्य-प्रस्तरों में परमात्मा प्रकट किया था। उनके ज्ञान की छेनी में वह धार थी कि जिसे वह छू जाती, उसमें परमात्मा प्रकट हो जाता। आइए, उनकी कृपा पाने वाले कुछ पात्रों के निर्माण क्रम का दर्शन करते हैं।

उन्हीं दिनों की बात है... अनेकानेक जनपदों में ज्ञान-ज्योति प्रज्वलित करते हुए महावीर साकेत में पधारे। महावीर के आगमन से साकेत का कण-कण हर्षित हो उठा। जन-जन का मन महावीर को देखने और सुनने के लिए उत्कंठित हो उठा।

साकेत का एक निवासी थाजिनदेव। वह भगवान महावीर का श्रावक (गृहस्थ अनुयायी) था। उन दिनों वह व्यापार हेतु कोटिवर्ष गया हुआ था। मर्यादानुसार कुछ बहुमूल्य रत्न लेकर वह कोटिवर्ष के राजा किरातराज के पास पहुँचा। उन रत्नों को देखकर किरातराज अति प्रसन्न हो उठा। बोला'वाह! जिनदेव, तुमने तो हमें मुग्ध कर दिया। इतने सुन्दर रत्न तो हमने पहले कभी नहीं देखे!' जिनदेव ने मौका संभाला और कहा'राजन्, ये रत्न तो कुछ भी नहीं। इससे अधिक चमकीले और मूल्यवान रत्न मेरे देश में मिलते हैं।'

किरातराज ( उत्सुकता से)-फिर तुम हमारे लिए वे रत्न क्यों नहीं लाए?

जिनदेव- उन्हें लाने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। यदि आप उन्हें पाना चाहते हैं, तो आपको स्वयं मेरे देश चलना होगा।

रत्नों का प्रेमी किरातराज तुरन्त साकेत प्रस्थान करने को अधीर हो उठा। जब वह साकेत पहुँचा, तो उसने वहाँ बहुत हलचल देखी। जिज्ञासावश उसने सार्थवाह से पूछा'क्या आज तुम्हारे नगर में कोई उत्सव है?'

जिनदेव- नहीं महाराज, उत्सव तो नहीं है।

किरातराज- फिर ये नागरिक इतने उल्लसित हो तेज़ कदमों से कहाँ जा रहे हैं?

जिनदेव- महाराज, हमारी नगरी में रत्नों का एक महा-व्यापारी आया है। कहते हैं, उसके पास वह बहुमूल्य रत्न है जो पूरी धरा पर किसी अन्य के पास नहीं।

किरातराज- फिर तुम विलंब क्यों कर रहे हो? हमें भी शीघ्र उस महा-व्यापारी के पास लेकर चलो।

जिनदेव- जैसी आपकी आज्ञा, राजन्।

तदोपरान्त जिनदेव किरातराज को अपने गुरुदेव भगवान महावीर के चरणों में ले गया। वहाँ पहुँचकर किरातराज ने भगवान महावीर से कहा'मैंने सुना है कि आप रत्नों के व्यापारी हैं। आपके पास एक बहुमूल्य रत्न है।'

महावीर मंद-मंद मुस्कुरा दिए। जिनदेव की ओर देखा। जिनदेव ने नेत्रों से ही सारी बात कह डाली और महावीर ने सुन ली। फिर वे किरातराज से बोले'तुमने सही सुना है, देवानुप्रिय!'

किरातराज- मैं उस रत्न को देखने का अभिलाषी हूँ। मेरी मनोकामना पूर्ण करें।

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