चित्रकला में भगवान नीले रंग के क्यों?
Akhand Gyan - Hindi|April 2021
अपनी साधना को इतना प्रबल करें कि अत्यंत गहरे नील वर्ण के सहस्रार चक्र तक पहुँचकर ईश्वर को पूर्ण रूप से प्राप्त कर लें।

भारत की चित्रकलाओं के बारे में जब भी चर्चा की जाती है, तो इतिहास हमें सरस्वती-सिन्धु घाटी की सभ्यता की ओर ले जाता है। उस प्राचीन सभ्यता में मिट्टी के बर्तनों पर बने चित्र और भीमबेटका की गुफाओं में उकरे हुए चित्र दिखाता है। निःसन्देह, भारत विविधताओं का देश है। और यह विविधता उसकी चित्रकलाओं में भी दिखाई देती है। हर प्रान्त की चित्रकला दूसरे प्रान्त की चित्रकला से एकदम अलग दिख पड़ती है। आप विषयवस्तु (Subject Matter), चित्रण शैली (Style) और रूपांकन/विशेष चिह्न (Motif) देखकर ही पहचान सकते हैं कि कौन सी चित्रकला कौन से प्रांत की है।

परन्तु पाठकगणों, इतनी विविधता होने के बाद भी एक बात ऐसी है, जिस स्तर पर इन सभी चित्रकलाओं में एक बहुत गहरी समानता मिलती है। वो यह कि इनमें भगवान के सगुण स्वरूप को अक्सर नीले रंग में दर्शाया जाता है। वैष्णव, शैव और शाक्त, तीनों परम्पराओं में हमें यही तथ्य देखने को मिलता है।

राजस्थान के नाथद्वारा की पिछवाई चित्रकला में भगवान श्रीनाथ जी को और भीलवाड़ा के फड़ चित्रों में भगवान देवनारायण को नीले रंग में चित्रित किया जाता है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की पहाड़ी चित्रकलाओं में माँ भद्रकाली के लिए; दक्षिण भारत की तंजावुर चित्रकला व मैसूर चित्रकला में भगवान शिव, भगवान मुरुगन, भगवान वेंकटेश्वर और भगवान राम के लिए: बिहार की टिकुली चित्रकला में भगवान कृष्ण के लिए और असम में भगवान विष्णु के सभी अवतारों को दर्शाने के लिए नीला रंग प्रयुक्त होता है (चित्र-क)। ओडिशा में पुरी के पटचित्रों में भी भगवान जगन्नाथ को गहरे नीले रंग में बहुत बार दर्शाया जाता है (चित्र-ख)।

केवल चित्रकला में ही नहीं, प्राचीन साहित्य ने भी भगवान के स्वरूप को अधिकतर नीले रंग में ही वर्णित किया है। श्रीहरि स्तोत्रम् में आता है-

नभो नीलकायं दुरावारमायं।

सुपद्मासहायं भजेऽहम् भजेऽहम्॥ (1)

अर्थात् श्रीहरि के स्वरूप को 'नीलकाय' कहा गया, यानी जिनकी काया का रंग नीला है।

हालाँकि ग्रंथों में भगवान के इन सभी रूपों को अलग-अलग रंगों से उपमाएँ दी गई हैं। जैसे कि भगवान शिव को 'कर्पूरगौरम' यानी कपूर के समान गौर वर्ण का कहा गया है। इसी प्रकार भगवान के विष्णु स्वरूप की स्तुति में प्रचलित तौर पर गाया जाता है-

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाड्.गम्॥

अर्थात् भगवान का स्वरूप मेघ वर्णीय है। यानी बादल जैसे रंग का है। अब बादल के रंग को काला भी माना जा सकता है। लेकिन फिर भी उन्हें अनेकानेक प्राचीन स्थलों पर नीले रंग में ही चित्रित किया जाता है। ऐसा भगवान मुरुगन और भगवान जगन्नाथ के साथ भी है।

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