अंतिम इच्छा
Akhand Gyan - Hindi|March 2021
भारत की धरा को समय-समय पर महापुरुषों, ऋषि-मुनियों व सद्गुरुओं के पावन चरणों की रज मिली है। आइए, आज उन्हीं में से एक महान तपस्वी महर्षि दधीची के त्यागमय, भक्तिमय और कल्याणकारी चरित्र को जानें।

एक बार देवर्षि नारद ऋषियों के साथ भक्तिपूर्ण चर्चा कर रहे थे। यकायक उनकी आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह उठी। इस दृश्य को देख सभी ऋषिगण चकित हो गए।पुलस्त्य ऋषि ने नारद जी से पूछा, 'सदा मुस्कुराते रहने वाले देवर्षि नारद की आँखों में आँसू? सहसा ऐसा क्या याद आ गया आपको, जिससे आप इतना भावाकुल हो उठे?' नारद जी ने स्वयं को सम्भाला और बोले, ऋषिश्रेष्ठ, असुरता के नाश के लिए अपने जीवन का सहज दान कर देने वाले महर्षि दधीचि का जीवन प्रसंग मुझे स्मरण हो आया। उसी ने मुझे भावाकुल कर दिया है।'

ऋषि पुलस्त्य- देवर्षि, कृपा कर महर्षि दधीचि के जीवन का वह अनमोल प्रसंग हमें भी सुनाएँ।

देवर्षि नारद- भगवान शिव महर्षि दधीचि के आराध्य थे। माँ भवानी उन्हें अपनी संतान मानती थीं। सभी दिव्य शक्तियाँ, सिद्धियाँ, विभूतियाँ उनकी आज्ञा पाने के लिए लालायित रहती थीं। परा, अपरा विद्याओं के वे प्रखर आचार्य थे। आध्यात्मिक ज्ञान तो उन्हें सहज ही प्राप्त था। उनकी साधना तो यौवन काल में ही शिखर पर पहुँच गयी थी। साध्य के सिद्ध होने पर कम ही लोग तप करते हैं। पर मैंने उन्हें आजीवन कठिन तप करते हुए देखा है।

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अंतिम इच्छा

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