आइए, शपथ लें..!
Akhand Gyan - Hindi|March 2021
एक शिष्य के जीवन में भी सबसे अधिक महत्त्व मात्र एक ही पहलू का हैवह हर साँस में गुरु की ओर उन्मुख हो। भूल से भी बागियों की ओर रुख करके गुरु से बेमुख न हो जाए। क्याकि गुरु से बेमुख होने का अर्थ है-शिष्यत्व का दागदार हो जाना! शिष्यत्व की हार हो जाना!

शास्त्र कहते हैं, एक शिष्य निरन्तर चलता है। इस 'निरन्तर' शब्द का अर्थ समझते हैं आप? ऐसा समर्पण, ऐसा चिंतन, ऐसी गति, ऐसी मति, ऐसा अरमान, ऐसा ईमानजिसमें न कोई अटकन हो, न कोई अड़चन। न कोई रुकावट हो, न ही थकावट! एक ऐसा सिलसिला, जिसका आरम्भ तो है, पर अंत नहीं।

वैसे भी, गुरु-भक्तों की डगर और उनका सफर तो हमेशा से संसार से जुदा ही रहा है... चाल में भी और अंदाज़ में भी! संसार में हासिल की गई किसी भी वस्तु पर निर्माण-तिथि के साथ समाप्ति-तिथि भी छपी होती है। सांसारिक नौकरी में भी यदि प्रवेश तिथि है, तो साथ में रिटायरमेंट (सेवा-निवृत्ति) तिथि भी है। पर ऐसा संसार में होता है, गुरु-दरबार में नहीं। यहाँ से प्राप्त किए गए शिष्यत्व की कोई समाप्ति या रिटायरमेंट तिथि नहीं होती। जीवन के समाप्त हो जाने के बाद भी नहीं! गुरु-सेवा के क्षेत्र में एक बार नियुक्ति हो जाने के पश्चात्, फिर कोई निवृत्ति नहीं होती। इस दायित्व को तो हर जन्म में निभाना होता है।

दगा करके दागदार न बनें...!

वर्षों पहले 'लाहौर ट्रिब्यून' में एक विज्ञापन छपा था। विज्ञापन कुछ इस प्रकार था -

चाहिए- एक व्यक्ति

जो अपनी ज़िन्दगी का सौदा करने के लिए तैयार हो-दस लाख रुपयों में!

इच्छुक लोग कृपया इस पते पर संपर्क करें-बॉक्स न. 15c/o द ट्रिब्यून , लाहौर

यह विज्ञापन तीन अलग-अलग मौकों पर छपा। निःसन्देह, प्रस्ताव बेहद लुभावना था... क्योंकि उस समय के दस लाख आज के करोड़ों के बराबर थे। इतनी बड़ी रकम!! फिर भी विज्ञापन छपवाने वाले को अपनी ज़िन्दगी का सौदा करने वाला एक भी ग्राहक नहीं मिला। मिलेगा भी कैसे? कौन अपनी कीमती ज़िन्दगी को इतना सस्ता बेचना पसंद करेगा? जीवन की कीमत की बात करें, तो क्या लगता है आपकोलगभग "कितनी होगी?

यूँ तो बुद्धिजीवियों ने अपने शोध एवं अनुसंधानों के आधार पर इसकी कीमत आंकने की कोशिश की है। येल विश्वविद्यालय के जीव-भौतिकशास्त्रीहैरोल्ड मोरोविट्ज़ ने इस सम्बन्ध में एक प्रोजैक्ट शुरु किया। हैरोल्ड ने सबसे पहले उन सारे रसायनों, स्थूल तत्त्वों इत्यादि की सूची बनाईजिनसे मिलकर मनुष्य का यह शरीर बना है। फिर एक-एक रसायन की कीमत को तालिका में भरा। तालिका कुछ इस प्रकार बनी

इस तरह सारी तालिका को जोड़ने के बाद कुल मिलाकर एक इंसान की कीमत आंकी गईकई सौ लाख डॉलर! इस हाड-माँस के ढाँचे की कीमत तो आंक ली गई। किन्तु क्या सचमुच एक इंसान की कीमत इस हाड-माँस से ही है? ऐसा होता, तो शायद क्विस्लिंग और ऐफिलायट्स जैसे लोगों की कीमत कौड़ियों से भी कम न आंकी जाती।

द्वितीय विश्व युद्ध के समय क्विस्लिंग नार्वे में सेना अधिकारी था। सत्ता के लालच में उसने जर्मनी के शासक हिटलर से हाथ मिला लिया। अपने देश से गद्दारी करके उसने हिटलर को सारी खुफिया जानकारी दे डाली। जर्मनी की सेना ने नार्वे पर हमला बोल दिया और नार्वे हिटलर के अधीन हो गया। हिटलर के आधिपत्य में क्विस्लिंग ‘मंत्री-राष्ट्रपति' बनकर नार्वे पर शासन करने लगा। परन्तु जल्द ही उसके शासन की चूलें हिल गईं, जब वहाँ के जन-मानस ने अनैतिकता और अत्याचार के विरुद्ध जंग छेड़ दी। नार्वे के लोग एकजुट हुए और उन्होंने हिटलर तथा क्विस्लिंग के आधिपत्य को उखाड़ फेंका। स्वतंत्र होने पर नार्वे के लोगों ने जो काम सबसे पहले किया, वह थाखुले मैदान में, सबके बीच, क्विस्लिंग को फांसी पर चढ़ाना! इधर क्विस्लिंग का नाम जीवित लोगों में से कटा और उधर शब्दकोश में उसका नाम गद्दार लोगों की लिस्ट में हमेशा के लिए जुड़ गया। अंग्रेज़ी शब्दकोश में एक मुहावरा शामिल कर दिया गया'Don't be a Quisling' यानी कभी क्विस्लिंग मत बनना क्योंकि "क्विस्लिंग' शब्द अब पर्याय बन चुका था, गद्दारी और मक्कारी का!

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