अपने संग चला लो, हे प्रभु!
Akhand Gyan - Hindi|April 2021
जलतरंग- शताब्दियों पूर्व भारत में ही विकसित हुआ था यह वाद्य यंत्र। संगीत जगत का अनुपम यंत्र! विश्व के प्राचीनतम वाद्य यंत्रों में से एक। भारतीय शास्त्रीय संगीत में आज भी इसका विशेष स्थान है। इतने आधुनिक और परिष्कृत यंत्र बनने के बावजूद भी जब कभी जलतरंग से मधुर व अनूठे सुर या राग छेड़े जाते हैं, तो गज़ब का समाँ बँध जाता है। सुनने वालों के हृदय तरंगमय हो उठते हैं।

यह जलतरंग है क्या? आइए जानते हैं। यह दो शब्दों का संगम हैजल+तरंग। अपने नाम को साकार करते इस यंत्र में प्यालों में भरे जल से तरंग उत्पन्न की जाती है। यही तरंग फिर संगीत बन कर प्रस्फुटित होती है। तभी इस वाद्य यंत्र को 'जलयंत्र' व 'जलतरंगम्' भी कहा जाता है। दरअसल यह यंत्र प्यालों की एक श्रृंखला है। ये प्याले काँसे या चीनी मिट्टी के बने होते हैं। अधिकांशतः पात्रों की संख्या 15 से 22 के बीच होती है। यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि आप इस यंत्र से कैसा संगीत निकालना चाहते हैं! इन सभी पात्रों को जल से भर कर अर्धगोलाकार ढंग से व्यवस्थित किया जाता है। इस शृंखला के मध्य में वादक बैठता है। यह संगीतवादक छड़ी अथवा लकड़ी की डंडी को प्यालों के किनारे पर मारता है, जिससे संगीत झंकृत होता है।

पाठकगणों, यह तो हमने आपको इस यंत्र की ऊपरी रूपरेखा बता दी। अब थोड़ा गहराई में जाकर विश्लेषण करते हैं। इस विलक्षण वाद्य यंत्र की कार्यशैली अपने में अद्भुत संदेश समेटे हुए है। इसकी कार्यशैली के दो प्रमुख पहलू है।

पहला पहलू- जलतरंग यंत्र में भिन्न-भिन्न आकार के प्याले प्रयोग किए जाते हैं। फिर इन पात्रों में अलग-अलग स्तर तक जल भरा जाता है। वादक इन विभिन्न आकार के प्यालों का बहुत निपुणता से उपयोग करता है। जैसे कि संगीत में मुख्यतः तीन सप्तक होते हैंमंद्र, मध्यम और तार। बड़े आकार के प्यालों पर छड़ी मारने से 'मंद्र' सप्तक के स्वर फूटते हैं। मध्यम आकार के प्यालों से 'मध्यम' सप्तक और छोटे माप के प्यालों से "तार' सप्तक के स्वरों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार अलग-अलग आकार के पात्रों से भिन्न-भिन्न सप्तक के स्वर निकाले जाते हैं। अतः जलतरंग वादक जैसे संगीत की रचना करनी होती है, वैसे ही माप के प्यालों का प्रयोग कर उनसे स्वर झंकृत करता है।

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