औपनिवेशिक भारत में हिंदी का विज्ञान-लेखन
Pratiman|January - June 2020
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश भारत में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के खुलने और स्कूली शिक्षा के प्रसार के साथ ही भारतीय भाषाओं में विभिन्न विषयों की पाठ्य -पुस्तकों की ज़रूरत भी शिद्दत से महसूस की गयी।
शुभनीत कौशिक

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश भारत में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के खुलने और स्कूली शिक्षा के प्रसार के साथ ही भारतीय भाषाओं में विभिन्न विषयों की पाठ्य -पुस्तकों की ज़रूरत भी शिद्दत से महसूस की गयी। इस क्रम में इतिहास, भूगोल, विज्ञान समेत तमाम विषयों की पाठ्य-पुस्तकें भारतीय भाषाओं में लिखी गयीं या अंग्रेज़ी से अनूदित की गयीं। इससे पहले भी ईसाई मिशनरियों और देश भर में जगह-जगह स्थापित टेक्स्ट-बुक सोसाइटी ने, कुछेक उत्साही ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीयों ने ऐसी पाठ्य-पुस्तकें तैयार करने के प्रयास ज़रूर किये थे। पर उनका दायरा काफ़ी सीमित था। पश्चिमोत्तर प्रांत में तो स्थिति और भी जटिल थी। यहाँ स्कूली पाठ्य-पुस्तकों की भाषा बनने के लिए हिंदी और उर्दू में परस्पर होड़ भी लगी हुई थी। हिंदी की बात करें तो उन्नीसवीं सदी के दौरान ओंकार भट्ट, राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, मुंशी अम्बिका प्रसाद और बालकृष्ण शास्त्री खण्डकर सरीखे विद्वानों ने हिंदी में विज्ञान समेत विविध विषयों की पाठ्य -पुस्तकें लिखने में बड़ी भूमिका निभायी।

राजा शिवप्रसाद ने इतिहास तिमिर नाशक, विद्यांकुर और भूगोलहस्तामलक सरीखी पाठ्यपुस्तकें लिखीं। विद्यांकुर में जहाँ उन्होंने प्राकृतिक विज्ञानों और समाज-विज्ञान के बारे में लिखा, वहीं तीन खण्डों वाली अपनी पुस्तक इतिहासतिमिरनाशक में उन्होंने भारतीय इतिहास का विवरण प्रस्तुत किया। 1859 में लिखी गयी भूगोलहस्तामलक में राजा शिवप्रसाद ने पृथ्वी पर मानवों की उत्पत्ति का संक्षिप्त परिचय देने के साथ ही भौतिक भूगोल का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया। इस पुस्तक में उन्होंने संसार के महाद्वीपों का परिचय कराने के साथ-साथ एशिया महाद्वीप और उसके अंतर्गत भारतीय उपमहाद्वीप का परिचय देते हुए श्मीर, सिक्किम, भूटान और पर्वतीय राज्यों के बारे में भी लिखा। राजा शिवप्रसाद ने इसी किताब के एक अध्याय में भारत के विभिन्न इलाकों में बसे हुए सामाजिक समूहों के शारीरिक लक्षणों और उनके व्यवहारों के बारे में भी लिखा। यह लिखते हुए शिवप्रसाद ने कई औपनिवेशिक रूढ़ियों व पूर्वाग्रहों को अपने लेखन में जस-का-तस अपना लिया। उनके लेखन में परिलक्षित होने वाली इस प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए इतिहासकार मनु गोस्वामी ने लिखा है : 'शिवप्रसाद द्वारा अपनी किताब में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के विषय में लिखते हुए औपनिवेशिक रूढ़ियों का इस्तेमाल असल में औपनिवेशिक भारत में ब्रिटिश नृजातीय विमर्श द्वारा प्रचलित सामान्यीकरण की प्रक्रिया की नक़ल करने की कोशिश है।'

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