भय की महामारी
Pratiman|January - June 2020
यह देखना एक त्रासद अनुभव है कि जिस कोविड-19 के भय से मानव इतिहास के सबसे बड़े परिवर्तनों में से एक के घटित होने की आशंका है, वह भय बेहद अनुपातहीन और अतिरेकपूर्ण है। इस बात के भी कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं कि इन प्रतिबंधों से वायरस के संक्रमण या इससे होने वाली कथित मौतों को रोका जा सकता है। बेलारूस, निकारागुआ, तुर्की, स्वीडन, नार्वे, तंजानिया, स्वीडन, जापान आदि अनेक देशों ने डब्ल्यूएचओ की प्रत्यक्ष और परोक्ष सलाहों तथा मीडिया द्वारा बार-बार लानत-मलामत किये जाने के बावजूद या तो बिल्कुल लॉकडाउन नहीं किया, या फिर बहुत हल्के प्रतिबंध रखे। इनमें से किसी देश में कहीं अधिक मौतें नहीं हुई हैं। यह सही है कि बड़ी संख्या में लोगों के कोरोना-संक्रमण की पुष्टि हो रही है, लेकिन उससे बड़ा सच यह है कि यह वायरस उन संक्रमित लोगों में से अधिकांश लोगों को 'बीमार' तक कर पाने में सक्षम नहीं है।

पिछले आठ महीने से सारी दुनिया कोविङ-19 ('कोरोना वायरस डिज़ीज़' जिसका पता 2019 में लगा) नामक संक्रामक रोग से आक्रांत है। इस बीमारी ने मनुष्य द्वारा रचित संसार के साथ ऐसा कुछ किया है जो पहले कभी न देखा गया, न सुना गया, और न ही कल्पित किया गया। वैसे तो प्रत्येक महामारी मनुष्य के मन में कुछ बेचैनियाँ पैदा करती ही हैं, लेकिन इस महामारी की अपूर्वता ज़्यादा बड़ी हद तक इसके प्रति सरकारी तंत्रों की अनुक्रिया, विश्वसंगठनों के रवैये, दैत्याकार मीडिया-कम्पनियों और गैर-सरकारी ग्लोबल संगठनों की कारिस्तानियों का संचित नतीजा है। इतालवी दार्शनिक आगाम्बेन के शब्दों में कहें तो इन ताक़तों ने मिल कर 'एक महामारी का आविष्कार' करके उसके प्रति अनुपातहीन भय' को जन्म दिया है। ये कारिस्तानियाँ इसलिए कामयाब हो पाईं कि महामारी से पैदा हुए भय को व्यक्तिगत और सामाजिक नियंत्रण के एक औज़ार में बदल जाने दिया गया। प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों से लेकर रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों जैसी चौधरी-संस्थाओं तक, जहाँ मौक़ा लगा, वहाँ इस डर का लाभ उठा कर छोटी से ले कर बड़ी निरंकुशताओं को पुष्ट किया गया। चंद अपवादों को छोड़ कर समाज और राज्य के आलोचक बुद्धिजीवियों ने भय को उपकरण बनाने वाले नियंत्रक और शासक-स्वार्थों को आड़े हाथों लेने की तत्परता नहीं दिखायी। नतीजतन इन शक्तियों को कोविड-19 का अधिक से अधिक भयादोहन करने का मौक़ा मिल गया।

बीसवीं सदी की शुरुआती अवधि प्लेग और स्पेनिश फ्लू जैसी महामारियों से आहत हुई थी। लेकिन उस दौर का इतिहास भी ऐसी किसी अपूर्वता की जानकारी नहीं देता। नब्बे के दशक में भूमण्डलीकरण की शुरुआत के बाद यानी पिछले तीस साल की छोटी-सी अवधि में विश्व ने कम से कम चार बड़ी महामारियों को देखा है। ये हैं एचआईवी, इबोला, एच1एन1 और ज़िका। इन चारों के भी राजनीतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव हुए हैं। लेकिन उनमें भी मनुष्य और उसके बनाए हुए संसार को इतनी निर्ममता से गतिशून्य कर देने की क्षमता नहीं थी। दरअसल, इन बीमारियों से लड़ने के लिए लॉकडाउन ( घरबंदी) जैसी युक्ति का इस्तेमाल नहीं किया गया। प्रत्येक महामारी के गर्भ से भय का जन्म होता है। असमय, अचानक और अघोषित मृत्यु के डर से मनुष्यता को स्तम्भित हो जाना पड़ता है। अतीत की हर महामारी किसी न किसी रूप में डर की ऐसी संरचनाओं को जन्म देती रही है। लेकिन, भूमण्डलीकरण के ज़माने की पाँचवीं बीमारी कोविड-19 के गर्भ से भय की एक ऐसी विश्वव्यापी जकड़बंदी ने जन्म लिया है जो पहले कभी नहीं देखी गयी। एक बड़ी हद तक यह जकड़बंदी लॉकडाउन की रणनीति का परिणाम है।

कोविड-19 की भयावहता का एक कारण यह बताया जाता है कि इसकी न कोई अंग्रेजी दवा है, न ही वैक्सीन। यानी जब तक इसकी वैक्सीन तैयार नहीं हो जाती, तब तक दुनिया ख़तरे में है। वास्तविकता यह है कि वायरस मनुष्यों का पीछा उस आदिमकाल से करते रहे हैं, जब वह ठीक से मनुष्य बना भी नहीं था और पेड़ों पर रहता था। हमारे शरीर वायरस से लड़ने की प्रक्रिया में सीखते रहे हैं। इस प्रक्रिया में हम बीमार हो जाते हैं और कभी-कभी ऐसी बीमारी घातक भी सिद्ध होती है। वायरस बार-बार आते हैं और हर बार हमारा शरीर सुरक्षा करना सीख जाता है और पहले की तुलना में मजबूत हो जाता है। यह सिलसिला लाखों सालों से चला आ रहा है। यही वजह है कि हमारे जीनोम की 40 प्रतिशत से अधिक समावेशी वायरल आनुवंशिक सामग्री से बनी है। कोविड -19 जैसे वायरस का प्रसार कोई नयी बात नहीं है। अगर कुछ नया है तो इससे संबंधित हमारी प्रतिक्रिया।

यह प्रतिक्रिया जिस तरह हुई है, या इसे जिस तरह से नियोजित रूप से करवाया गया है, उससे निकलने वाले डर के इस शिकंजे की संरचनाएँ बहुमुखी हैं। वे व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, स्वास्थ्य संबंधी और आर्थिक दायरे को गहराई से प्रभावित कर रही हैं। व्यक्तिगत स्तर पर मनुष्य अकेलेपन और अजनबीयत की यातना भोगने के लिए अभिशप्त है। सामाजिक स्तर पर सामुदायिक सुरक्षा का ताना-बाना बेअसर हो गया है। दुनिया भर में ग़रीबों पर, विशेषकर भारत में, ऐसी मार पड़ी है जिसके बारे में कभी कल्पना भी नहीं की गयी थी। राजनीतिक स्तर पर लोकतंत्र के आग्रह और असहमति के स्वरों को क्वारंटीन में धकेल दिया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में विश्वविद्यालय और कॉलेज के खुले परिसर को एक आयताकार डिजिटल स्क्रीन की संकीर्णताओं में कैद कर दिया गया है। स्वास्थ्य प्रणालियों ने कोरोना-केंद्रित हो कर अन्य रोगों की तरफ़ से मुँह फेर लिया है। सामाजिक दूरियों ने सांस्कृतिक गतिकी और रचनाशीलता लगभग शून्य कर दी है। अर्थव्यवस्थाएँ तबाही के कगार पर हैं।

लॉकडाउन के दौरान न उत्पादन हुआ, न उपभोग, न आमदनी, न ख़र्च। पूरे समाज पर प्रलय के बाद छा जाने वाली वीरानगी हावी हो गयी। वह एक विशाल अस्पताल जैसा लगने लगा जिसमें केवल दवा की दूकानें ही खोलने की इजाज़त थी।

गूगल ट्रेंड बताता है कि फ़रवरी से अप्रैल के बीच दुनिया के अधिकांश लोग इंटरनेट पर सिर्फ इसी महामारी के बारे में जानकारियाँ जुटा रहे थे। जिज्ञासा इतनी थी कि लोगों ने इन महीनों में रात में सोने से पहले और सुबह जागने के बाद सबसे पहले इसी विषय पर खोजबीन की।मानव इतिहास में एक साथ एक विषय पर इतनी जिज्ञासा कभी नहीं रही। गूगल ट्रेंड के ही अनुसार जुलाई आते-आते लोग थकने लगे। उनके पास बस यही सवाल बचा कि क्या यह संक्रामक रोग कमज़ोर हो रहा है, क्या यह कभी ख़त्म होगा? हमारा युग सूचनाओं की भरमार और उनके अबाध प्रवाह के लिए जाना जाता है। ऐसे युग में भी चीन, अमेरिका, युरोप और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी ग्लोबल ताक़तें अगर इस महामारी के बारे में अनिश्चितता का निवारण कर सकने वाली आधिकारिक सिक्काबंद सूचनाएँ देने को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाती हैं, तो यही माना जा जाएगा कि कहीं न कहीं अनिश्चितता से उपजने वाले भय की खेती कुछ अपरिभाषित निहित स्वार्थों द्वारा की जा रही है। इस अभूतपूर्व परिस्थिति का समाज-वैज्ञानिक आख्यान आने वाले समय में रचा जाएगा। लेकिन, उस घटनाक्रम, उन तथ्यों और उन शक्तियों की गतिविधियों को समय के पटल पर अंकित करना ज़रूरी है जो कोरोना-प्रसूत भय और उसके असाधारण परिणामों की ज़िम्मेदार हैं।

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