महाभारत और सौंदर्यशास्त्र की चरम अनुभूति
Pratiman|January - June 2020
यथार्थ का अतिक्रमण : प्राचीन और आधुनिक आख्यानों का अंतर
सुदीप्त कविराज

महाभारत आधुनिक उपन्यास नहीं है इसकी रचना और पाठ का तर्क आधुनिक कथाओं से एकदम अलग है। आधुनिक गल्प अपने सबसे सशक्त रूप में दुनिया की एक ऐसी छवि प्रस्तुत करना चाहता है जो यथार्थ जितनी ही असल होती है। इसके ठीक विपरीत, महाभारत जैसी महाकाव्यात्मक कृतियाँ 'यथार्थ से आगे' का संधान करती हैं। हम इस पदबंध की तह में जा कर देखेंगे कि इसके और क्या-क्या आशय हो सकते हैं। अब मैं यह स्पष्ट करने की कोशिश करूँगा कि चरम या आत्यंतिक कहने के पीछे मेरा क्या आशय है। मुझे लगता है कि महाभारत मुख्यतः मनुष्य के दुख का संधान करता है : इस रचना के आख्यान की योजना में मृत्यु की युद्धजनित पीड़ा और स्त्रियों का दुख किसी भी तरह गौण विषय नहीं है। मुझे लगता है कि इस विस्तृत, जटिल और घुमावदार कथा के आख्यान में एक चरमवादी अंतर्दृष्टि निहित है। उसका रुझान आज के आधुनिक अतिवाद की तरफ़ नहीं है। वह युद्धजनित मृत्यु जैसे गहरे प्रश्न को तब तक सान पर चढ़ाती जाती है जब तक वह प्रश्न आख्यान की सामान्य सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर जाता; और विचार अपने अंतिम पड़ाव तक नहीं पहुँच जाता। ऐसे कई प्राक् आधुनिक आख्यान हैं जिनमें युद्धजनित मृत्यु का उल्लेख आता है। परंतु महाभारत एक ऐसे युद्ध का वृत्तांत रचता है जिसकी अठारह अक्षौहिणी सेना में दस से भी कम सैनिक जीवित बच पाते हैं। महाभारत में यह बोध सन्निहित है कि कामनाओं के कारण स्त्रियाँ ख़तरे में पड़ सकती हैं, लेकिन वह उनके लिए एक ऐसी नियति की विचारणा करता है जो बलात्कार से भी ज्यादा भयावह है। मनुष्य के एक साझे अनुभव को सौंदर्यशास्त्र की तकनीक अथवा प्रक्रिया से गुज़ार कर वह उसे तब तक एक चरम स्थिति की ओर धकेलता जाता है, जब तक हम तमाम हदबंदियों को पार करते हुए चिंतन के एक नितांत अपरिचित इलाके में नहीं पहुँच जाते। वह हमें विस्मय, भय और दया से भर देता है, लेकिन साथ ही हमें सोचने के लिए भी मजबूर करता है।

इसकी विस्तृत कथा-संरचना हमें बार-बार यह प्रश्न पूछने के लिए उद्धत करती है कि इस कथा का केंद्र किस प्रसंग या पात्र में निहित है। जाहिर है कि इन दोनों प्रश्नों के आसपास अलगअलग मतों का एक पूरा सिलसिला खड़ा हो चुका है। महाभारत के आख्यान और उसकी दार्शनिक बनावट के चिर-परिचित भाष्य से हट कर मैं यह कहना चाहता हूँ कि उसमें अर्जुन, युधिष्ठिर अथवा कृष्ण केंद्रीय पात्र नहीं हैं। अगर हम आख्यान को रचना के आंतरिक घटना-क्रम के सीमित अर्थ में देखें तो उसके केंद्रीय पात्र होने का गौरव निस्संदेह द्रौपदी के पक्ष में जाएगा। संदेहास्पद अथवा अस्पष्ट कुलनाम धारी नायकों के बरअक्स– जिन्हें विभिन्न देवताओं का वंशज होने के नाते अति-मानवीय गुणों से मण्डित किया जाता है, द्रौपदी मनुष्य के विरल गुणों की प्रतिमूर्ति के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देती। और यह तब है जबकि उसे प्रतिशोध की अग्नि से उत्पन्न बताया गया है। वह आख्यान में आनेवाली विपत्तियों का मुक़ाबला अपनी निपट मानवीय वेध्यता और साहस के बल पर करती है।

इस कथा के केंद्र में कौन स्थित हैइस प्रश्न पर दूसरे तरीके से भी विचार किया जा सकता है। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि कथा का केंद्रीय पात्र स्वयं वह कथा-वाचक ही है जो आख्यान के अलग-अलग मुक़ामों पर उसके भीतर-बाहर आवाजाही करता रहता है। मैं इस महाकाव्यात्मक आख्यान में निहित प्रज्ञा की इसलिए सराहना करता हूँ क्योंकि उसमें लेखकीयता की डोर किसी व्यक्ति के पास न होकर अदृश्य बनी रहती है। और इसके चलते यह कथा बहुत से अनाम-अज्ञात लेखकों के हाथों इस तरह आगे बढ़ती गयी है कि उसमें मानव-संसार को देखने-परखने की संगति और अंतश्चेतना में ज़रा भी विचलन नहीं आता। यही वजह है कि महाभारत को किसी एक रचनाकार की कृति मानने की बात कल्पनातीत लगती है। इस रचना के किसी एक देहधारी लेखक की खोज करने के बजाय ज़्यादा बेहतर जवाब यह पूछने में निहित है कि इस महाकाव्य की रचना किसने की? इसके जवाब में यह कहना कि इसके रचनाकार सर्व-द्रष्टा व्यास थे, उसी बात को ज़रा कम शब्दों में व्यक्त करने जैसा है। मैं यहाँ इस सूत्र को आगे बढ़ाना चाहता हूँ कि एक सुनिश्चित अर्थ में महाभारत का कोई एक रचनाकार तो नहीं है, परंतु उसमें आख्यान की एक ऐसी ऊर्जस्वित सुसंगति मौजूद है जो कथ्य और कथन की शैली के सही चुनाव में कभी ग़लती नहीं करती।

एक ईरानी छात्रा ने मुझसे कक्षा में एक बात कही थी। वह यह सुनते-समझते बड़ी हुई है कि हिंदुओं की सभ्यता अत्यंत परिष्कृत और गूढ़ है, परंतु उसे कभी यह समझ नहीं आया ऐसी सभ्यता में पले-पढ़े लोग एक ऐसी अथाह विकृति से भरी कथा के दीवाने कैसे हो सकते हैं जिसमें लगातार ऐसी घटनाएँ घटती जाती हैं जिन्हें यथार्थ की दृष्टि से सम्भव और नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जा सकता। इस छात्रा की पूर्व अध्यापिका को यह कथा इसलिए विकृत लगती थी क्योंकि उसमें केवल विरल संयोगों की बात की गयी थी। आज सोचता हूँ तो लगता है कि उस छात्रा की अध्यापिका बहुत संवेदनशील रही होंगी। जाहिर है कि वह महाभारत के चमत्कार-वैचित्र्य से चकित हुई होगी। हाँ, आख्यान के नायक के संबंध में उसकी राय ग़लत और सही, दोनों श्रेणियों में आती थी। कथा के आख्यान में एक बुनियादी तत्त्व को लेकर उसका इशारा निस्संदेह सही था, लेकिन वह शायद यह बात नहीं समझ पा रही थी कि कथा के पाठक उसे किस तरह देखते हैं या फिर इसे पढ़ कर उन पर क्या प्रभाव पड़ता है। भारत में सौंदर्यशास्त्र के महानतम दार्शनिक अभिनवगुप्त का मानना था कि उदात्त साहित्य का उद्देश्य भी यही होता है : वह हमारे साथ घटित होता है। सच यह है कि कोई भी महान् कथा केवल आख्यान के अपरिभाषेय स्पेस में सम्पन्न नहीं होती, बल्कि उसका क्रीड़ा-स्थल हमारा आभ्यंतर होता है । यह अंतर्दृष्टि बहुत कुछ बाख्तिन की उस उक्ति के नज़दीक बैठती है जो उन्होंने दास्तॉयव्स्की के उपन्यासों में आने वाले अबूझ पात्रों के बारे में कही थी।

मुझे यहाँ अपने ऊपर एक दूसरी तरह के ऋणरवींद्रनाथ ठाकुर के उस अमिट और निरंतर बढ़ते ऋण की बात भी स्वीकार कर लेनी चाहिए जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं। कभी मेरे मित्र चार्ली हैलिसे ने मुझसे रवींद्रनाथ और बौद्ध धर्म पर एक लेख लिखने का इसरार किया था। वह लेख लिखते हुए मैंने महसूस किया कि रवींद्रनाथ महाभारत के बजाय जातक-कथाओं को ज्यादा महत्त्व देते प्रतीत होते हैं। महाभारत के इस सवाल पर मेरा ध्यान उक्त लेख के बाद ही गया था।

महाभारत एवं सौंदर्यानुभूति का चरम

बाख़्तिन को दास्तॉयव्स्की में एक अजीब बात नज़र आती थी। मुझे लगता है कि महाभारत के साथ भी एक अजूबी और अनूठी चीज़ जुड़ी है। अरस्तू के मुहावरे में कहें तो इस दुनिया में कुछ भी अजूबा, हैरतनाक़ या व्यग्र करने वाला नहीं है। ऐसी दुनिया में यह कथा हमें कहानी के आश्चर्यपूर्ण संयोगों और घुमावों में तल्लीन होने की गुंजाइश नहीं देती। महाभारत की कथा हमें एक गहरे स्तर पर व्यग्र करती है : हमें इस कथा में पैदा होने वाले अनपेक्षित घुमाव नहीं, बल्कि पात्रों और उनके संबंधों के ज़रिये कथा को गति देने वाली घटनाओं की आधारभूत परत ज्यादा चकित करती है। दरअसल, इस रचना में व्यक्त व्यग्रता और पात्रों व कथा के आसंगों का समस्त वैचित्र्य उनके संबंधों में छिपा है। रचना में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि उसका आख्यान कतिपय गुणों के वर्गीकरण तथा उन गुणों के विशुद्ध और अतिरेकी रूप का प्रतिनिधित्व कर रहे पात्रों पर टिका है। अतिरेक महाभारत का प्रधान और अविस्मरणीय गुण है। एक तरह से वह अतिरेक का काव्य है। युधिष्ठिर अथवा दुर्योधन, द्रौपदी या भीष्म आदि सत्यनिष्ठा, दुभावना/सत्ता की ललक, सुंदरता या कमनीयता तथा नैतिक संकल्प जैसे गुणों के अतिरेकी रूप की ओर इंगित करते हैं। उसमें इस चित्रण के सूक्ष्मतर रूप भी लक्षित किये जा सकते हैं। महाभारत क्षत्रिय नायकत्व की कथा है। लिहाजा, उसमें नायकत्व के प्रतिपादन या सच्चे योद्धा के गुणों का निरूपण हमें चकित नहीं करता। इस मामले में भीम और अर्जुन की भिन्नता बहुत कुछ उजागर कर देती है। अधिकांश वास्तविक योद्धा शारीरिक दमखम और व्यावहारिक कुशलता का प्रतिनिधित्व करते हैं : हम भी यह मान कर चलते हैं कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में सभी योद्धा इन दो गुणों का न्यूनाधिक मात्रा में प्रदर्शन करेंगे। लेकिन गौर करिए कि भीम और अर्जुन एक-दूसरे से कितने अलग नज़र आते हैं : भीम शारीरिक शक्ति के पुंज हैं, वह अपनी अनगढ़ शक्ति से दुर्योधन का संहार करके कथा को उसके उपसंहार की ओर ले जाते हैं दुर्योधन के वध में भीम निरी अनगढ़ शक्ति का प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि गदा-संचालन के हुनर में वे दुर्योधन जितने पारंगत नहीं हैं। भीम के विपरीत, अर्जुन एक ऐसे योद्धा हैं जिसे कुशलता का शुद्धतम प्रतिरूप कहा जा सकता है। वे केवल धनुर्विद्या में ही अपराजेय नहीं हैं : जब भीष्म को प्यास लगी होती है तो तमाम धनुर्धर योद्धाओं में अर्जुन ही अकेला योद्धा हैं जो धरती की सतह भेद कर जल की धारा पैदा कर सकते हैं। महाभारत में ऐसे 'विशुद्ध' और अतिरेकी चरित्र एवं भयावह परिस्थितियाँ इसलिए आती हैं ताकि हम दुनिया के अस्तित्व पर इन लक्षणों के ज़रिये विचार कर सकें : हम देख सकते हैं कि इन पात्रों के विशुद्ध और एकल गुणधर्म का आख्यान दुनिया को किस तर्क की ओर ले जाएगा। अब मैं इस चरमपंथी कथा के कुछ प्रत्यक्ष और उदग्र उदाहरणों की तरफ़ ध्यान खींचना चाहूँगा। इस कथा की कल्पना का वितान इतना निबंध और सशक्त है कि अपने आख्यान के अमिट और आत्यंतिक विन्यास से वह हमारी नैतिकता के बोध को ढाँप लेना चाहता है।

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