भाषा परिवार और सभ्यता का नस्ली सिद्धांत
Pratiman|January - June 2020
अठारहवीं से लेकर उन्नीसवीं सदी के दौरान युरोप के बौद्धिक मानस पर धर्म, समाज, राष्ट्र और नस्ल की श्रेष्ठता को भाषाओं की श्रेष्ठता के आईने में देखने का रुझान हावी था।
अभय कुमार दुबे

इस अवधि के युरोपीय बुद्धिजीवी इनसे संबंधित विचारों और तात्पर्यों को भिन्न-भिन्न श्रेणियों की तरह सम्बोधित करने के बजाय मिले-जुले ढंग से इस्तेमाल करते थे। 1770 में जर्मन दार्शनिक योगान गोटफ्रीड हर्डर से लेकर 1862 में लंदन में सक्रिय फ्रीड्रिल मैक्स मुलर तक विद्वानों का लम्बा सिलसिला इस रवैये का साफ़ तौर पर मुज़ाहिरा करता है। ये लोग भाषा में 'मानवीय इतिहास की प्रगति' और युरोपियन 'नस्ल के सम्पूर्ण इतिहास का जीवंत और बोलता हुआ' साक्ष्य देख रहे थे। युरोपीय भाषाओं को ईश्वर-प्रदत्त भाषा (जिसे जन्नत में हज़रत आदम बोलते थे) की वंशावली का स्वाभाविक अंग बताया जा रहा था। धरती पर ये भाषाएँ ग्रीक-लैटिन-हिब्रू के भाषा परिवार की प्रमुख शाखाओं के रूप में पेश की जा रही थीं। भाषा, भूगर्भशास्त्र, राष्ट्र और युरो-क्रिश्चियनिटी' के पाठ इस तरह आपस में गुंथे हुए थे कि एक तरफ़ तो फ़िलोलॅजी (ऐतिहासिक भाषाशास्त्र) और थियोलॅजी (धर्मशास्त्र) को अलग-अलग करके देखा जाना मुश्किल था; दूसरी ओर भाषा-अध्ययन की शब्दावली में 'फॉसिल', 'स्केलटन', 'बोन', 'रॉकफ़ार्मेशन' जैसे पदों की भरमार हो गयी थी।

उपनिवेशवाद के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के लिए यह अवधि तीन परस्पर संबंधित आयामों के कारण बेहद महत्त्वपूर्ण थी। इनमें पहला आयाम था भाषाअध्ययन का, जो उन दिनों युरोप में नयी करवट ले रहा था। पुरानी फ़िलोलॅजी की जगह नयी फ़िलोलॅजी अपने क़दम जमा रही थी। हांस आर्सलेफ़ के शब्दों में कहें तो पुरानी फ़िलोलॅजी मानसिक श्रेणियों के संदर्भ में भाषा पर दार्शनिक दृष्टि से चिंतन करते हुए व्युत्पत्तिशास्त्रीय अटकलों का इस्तेमाल करती थी। लेकिन, नयी फ़िलोलॅजी इस रवैये का खण्डन करते हुए इतिहास-केंद्रित होने के पक्ष में थी। उसके पैरोकारों का दावा था कि वे तथ्य और प्रमाण जुटाने पर यक़ीन करते हैं। लेकिन, ये तथ्य और प्रमाण क्यों जुटाए जाते थे? हारुको मोमा के अनुसार फ़िलोलॅजी के बौद्धिक अनुशासन के तहत संस्कृत और फ़ारसी जैसी गैर-युरोपीय भाषाओं पर भी ध्यान दिया जाता था, लेकिन उस उद्यम का मुख्य उद्देश्य युरोपीय अस्मिता की भाषाई, सांस्कृतिक और नस्ली वंशावली पर प्रकाश डालना ही होता था। दूसरा आयाम था साम्राज्यिक औचित्य के केंद्र में आर्य-श्रेष्ठता का नया तर्क स्थापित करना। इसी आधार पर उपनिवेशितों के वजूद पर भी आर्य या अनार्य की छवियाँ प्रक्षेपित की जा रही थीं। नव-प्राच्यवाद और नस्ल के आपसी संबंधों के अध्येता टोनी बैलेंटाइन के अनुसार आर्य-श्रेष्ठता का विचार साम्राज्य की संस्कृति के दायरे के भीतर इस क़दर अहम हो गया था कि अंग्रेज़ उसी के आईने में उपनिवेशित समाजों के अतीत का विश्लेषण करते थे, और उसी के ज़रिये स्वयं अपने वर्तमान का। आर्य की श्रेणी के हिसाब से ही मूल्य-निर्धारण किया जाता था। मसलन, इस दौरान साम्राज्य को अनौपचारिक रूप से 'ऊर्जावान' आर्यों (इस श्रेणी में अंग्रेज़ ख़ुद को रखते थे), गिरावट के शिकार हो चुके आर्य समुदायों (जैसे, भारत जो नव-प्राच्यवादियों की निगाह में एक स्वर्णिम आर्य अतीत का मालिक था, लेकिन उसके बाद आये लम्बे अंधकार युग के कारण अंग्रेज़ों के हाथों अपने उद्धार की प्रतीक्षा कर रहा था) और पिछड़े हुए गैर-आर्य उपनिवेशों (जिनमें अपने आर्य शासकों के सम्पर्क और प्रेरणा के ज़रिये कुछ दमखम आ रही थी) में बाँट कर देखना एक आम बात थी। यह श्रेणीकरण एक ऐसे विमर्शी उद्यम का परिणाम था, जो कमोबेश स्थायी साबित हुआ। बावजूद इसके कि विद्वानों के बीच इसके खण्डन का सिलसिला कोई पौने दो सौ साल से जारी है, विमर्श का प्रभाव आज तक दुनिया के कई सांस्कृतिक-राजनीतिक क्षेत्रों में लोगों, समुदायों, संस्कृतियों और भाषाओं की आत्म-छवि तय करता है। तीसरा पहलू यह था कि युरोपीय विद्वान ओल्ड टेस्टामेंट के 'जेनेसिस' नामक अध्याय में दर्ज सृष्टि-रचना, मानवीय इतिहास के विकास-क्रम और उसमें भाषा की भूमिका का औचित्य-प्रतिपादन करने के उद्यम में लगे हुए थे। 'जेनेसिस' में लिखे हुए एक-एक शब्द को सही प्रमाणित करने की होड़ मची हुई थी। प्राच्य-अध्ययन के संदर्भ में इसे 'बिब्लिकिल ओरिएंटलिज़म' की संज्ञा दी गयी है। चूँकि इस बाइबिल-प्रदत्त इतिहास के केंद्र में भाषा थी, इसलिए ज़्यादातर फ़िलोलॅजिस्ट और भाषा-विज्ञानी ईसाई धर्म-प्रतिष्ठान से ही निकलते थे। मार्क्सवादी भाषाचिंतक वी.आई. वोलोसिनोव की वह टिप्पणी इस संबंध में उद्धृत करने योग्य है जिसमें वे कहते हैं कि 'पहले फ़िलोलॅजिस्ट और पहले भाषा-विज्ञानी हमेशा और हर जगह पादरी ही होते थे।'

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