यौन-हिंसा और भारतीय राज्य
Pratiman|July - December 2019
विसंगतियों के आईने में
पूजा बख़्शी

यह शोध-पत्र दिसम्बर, 2012 में दिल्ली में हुए क्रूर सामूहिक बलात्कार की घटना पर भारतीय राज्य की प्रतिक्रियाओं का परीक्षण करता है। यह आलेख उत्तर-औपनिवेशिक नारीवाद की इस समझ पर आधारित है कि राज्य एक सजातीय संस्था नहीं है। इसमें अपराध की जवाबदेही तय करने के लिए नियुक्त किये गये दो राजकीय निकायों-जस्टिस वर्मा कमेटी और जस्टिस ऊषा मेहरा कमीशन– के दृष्टिकोण और सिफ़ारिशों में अंतर्निहित भेदों की जाँच करने का प्रयास किया गया है।

परिचय

यौन-हिंसा के प्रति भारतीय राज्य की प्रतिक्रिया महिला और राज्य के बीच के विरोधाभासी संबंधों में स्थापित करना ज़रूरी है। राज्य के पास एक पितृसत्तात्मक संस्थागत तंत्र है, जिसके कारण महिलाएँ पीड़ित होती हैं। दूसरी तरफ़, महिलाएँ लैंगिक संवेदनशीलता से सम्पन्न संस्थागत बदलाव लाने के लिए समर्थन गोलबंद करते हुए दबाव समूहों की रचना करती हैं।

यौन-हिंसा के प्रति भारतीय राज्य की प्रतिक्रियाओं में विसंगतियों को दर्शाने के लिए यह लेख 2012 में दिल्ली में घटित सामूहिक बलात्कार के मामले का अध्ययन करता है। यह अध्ययन इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इस घटना के बाद ही तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने यौन-हिंसा के विरुद्ध आपराधिक क़ानूनों में कुछ प्रमुख संशोधन पारित किये। इस प्रकार यह घटना

महिलाओं के भारतीय राज्य के साथ पारस्परिक व्यवहारों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई। यह लेख जस्टिस वर्मा कमेटी और जस्टिस ऊषा मेहरा कमीशन द्वारा प्रस्तुत दो रपटों पर केंद्रित है।

इस लेख के केंद्रीय तर्क की दो परतें हैं। 2012 में घटित सामूहिक बलात्कार के प्रति भारतीय राज्य की प्रतिक्रिया की प्रकृति एक जैसी नहीं थी। इस भिन्नता को इन राजकीय निकायों द्वारा इस मामले को समझने में अपनाए गये दृष्टिकोणों के बीच मतभेदों में स्थित करने की आवश्यकता है। ऐसा लगता है कि जस्टिस ऊषा मेहरा कमीशन पुलिस एवं अन्य एजेंसियों के साथ जुड़ाव तथा उन्हें किसी भी महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक पुनर्मूल्यांकन से बचाने के राजकीय एजेंडे से बँधा हुआ था। दूसरी तरफ़ जस्टिस वर्मा कमेटी के ज़रिये यौन-हिंसा के संबंध में कुछ प्रगतिशील हस्तक्षेप होते हुए दिखाई पड़े हैं जिनमें लैंगिक संवेदनशीलता दिखती है। वर्मा कमेटी ने भारत में नारीवादियों की उपस्थिति और यौन-हिंसा के पहलुओं पर उनके शोध से अपना राबिता क़ायम किया है।

वर्मा कमेटी और मेहरा कमीशन की रपटों के तुलनात्मक विश्लेषण से पहले इस पर्चे में यौन-हिंसा के प्रति भारत राज्य की प्रतिक्रिया की एक सैद्धांतिक रूपरेखा तैयार करने की कोशिश की है, जिसका आधार उत्तर-औपनिवेशिक नारीवादी दृष्टि है।

उत्तर-औपनिवेशिक नारीवादी दृष्टिकोण के प्रमुख पहलू

उत्तर-औपनिवेशिक नारीवादी दृष्टिकोण तीन कारणों से अनुभवजन्य वास्तविकताओं के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए एक बेहतर सैद्धांतिक खाँचा प्रदान करता है। पहला कारण है, पश्चिमी नारीवादियों के काम में प्रचलित सार्वभौम प्रवृत्तियों से इतर एवं तार्किक अनुमान के रूप में, वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) में महिलाओं के विभिन्न सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संदर्भो की विशिष्टताओं को पहचानते हुए नारीवादी सिद्धांत को वैश्विक स्वरूप देने की प्रतिबद्धता।' उनका नज़रिया वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक उपकरणों का प्रयोग करता हुआ संघर्ष और मुक्ति के कथ्य में व्याप्त रैखिकता पर सवाल उठाता है, एवं इसे बहुलतावादी स्वरूप देने की दिशा में पश्चिम से इतर नारीवादी संघर्ष एवं मुक्ति के कथ्य के लिए स्थान तलाशता है। दूसरा कारण उनका यह तर्क है कि राज्य एक सजातीय निकाय नहीं है, बल्कि एक विजातीय निकाय है, जहाँ यौन-हिंसा के मामले में राज्य की विभिन्न एजेंसियाँ एक ही घटना की प्रतिक्रिया अलग- अलग तरीके से करती हैं। तीसरा, यहाँ रेखांकित करने की ज़रूरत है कि औपनिवेशिक एवं उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भ में 'क़ानून' ने एक ऐसे आलोचनात्मक स्थल की रचना की है जहाँ संघर्ष के ज़रिये पदसोपानीय लैंगिक संबंधों को बदलने की कोशिश की जा सकती है।

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