मेरी अंग्रेज़ी की कहानी
Pratiman|July - December 2019
अंग्रेज़ी जातिगत विशेषाधिकारों को मजबूत करती है, वर्गीय गतिशीलता के नियम तय करती है और व्यक्ति को एजेंसी से लैस करती है। क्या अंग्रेजों के सामाजिक इतिहास का कोई आत्मकथात्मक आयाम उसकी इस भूमिका की ख़बर दे सकता है? प्रस्तुत निबंध में इसी जोखिम से मुठभेड़ करने की कोशिश की गयी है।
सतीश देशपाण्डे

जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, यह सिलसिला 'सिमिलर' (सदृश्य) शब्द से शुरू हुआ था। उस वक़्त मैं सात का और मेरा छोटा भाई चार साल का था। उन दिनों हम आज के छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्य प्रदेश) के एक छोटे से क़स्बे दल्ली राजहरा में रहते थे जिसे अपनी खदानों के लिए जाना जाता था। मेरे पिता वहाँ एक सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी में इंजीनियर थे।

हमारे घर से अगले मकान में सिद्दीक़ी परिवार रहता था। पति-पत्नी निस्संतान थे। वे हमें बड़े प्यार से घर बुलाते थे। उनकी बैठक में धातु की बनी एक आयताकार फ़ोल्डिंग मेज़ थी। ठीक ऐसी ही एक मेज़ हमारे यहाँ भी थी। समुद्र की सतह जैसी नीली चित्तीदार सतह और ट्यूब के फ्रेम वाली यह मेज़ उन दिनों फ़ैशन में थी।

बहरहाल, एक शाम जब सिद्दीक़ी साहब के यहाँ मेहमान चाय पी रहे थे तो पता नहीं कैसे बातचीत मेज़ के बारे में होने लगी। मैंने वहाँ बैठे लोगों के सामने ऐलान किया कि ऐसी ही एक मेज़ हमारे यहाँ भी है। यह बातचीत उसी जुबान में चल रही थी जिसमें लोगबाग हिंदी के साथ अंग्रेज़ी के शब्द धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि मुझे यह तो याद नहीं है कि मैंने ठीक-ठीक क्या कहा था, लेकिन मैंने अंग्रेज़ी में एक पूरा वाक्य बोलते हुए उसमें 'सिमिलर' शब्द का इस्तेमाल किया था। मेरा वाक्य सुन कर सिद्दीक़ी साहब, जो हमेशा ही मुझसे बेहद लाड़ करते थे, ख़ुशी से झूम उठे। उनके मेहमान भी थोड़े भौचक्के हो गये। मुझे याद है कि यह देख कर मैं ख़ुश भी हुआ और थोड़ा शरमा भी गया। मेरे लिए यह एक सुखद अनुभव था। मैं इतना खुश था कि तुरंत दौड़ा-दौड़ा घर गया और माँ के सामने सारी बात कह डाली। मैं भावविभोर था और अपने घर में बोली जाने वाली एकमात्र जुबान- कन्नड़ में बोले जा रहा था। शुरू में माँ को कुछ समझ ही नहीं आया कि मैं क्या कह रहा हूँ। जैसा कि हमारे माता-पिता अकसर करते हैं, उसे लगा कि मैं सिद्दीक़ी साहब के यहाँ कुछ गड़बड़ कर आया हूँ जिसके लिए उन्हें माफ़ी माँगनी पड़ेगी। लेकिन, आख़िर में उन्हें यह बात समझ आ गयी कि दरअसल मैंने उनका नाम ऊँचा किया है क्योंकि मैं अंग्रेज़ी का एक ख़ास शब्द जानता हूँ।

दार्शनिक कहते हैं कि दुनिया में हमारी आदि और सबसे बुनियादी धरोहर भाषा होती है। सच यही है कि हमें हमारी दुनिया भाषा के ज़रिये ही मिलती है। एक निश्चित अर्थ में यह भी कहा जा सकता है कि भाषा ही दुनिया होती है। लेकिन, स्वतंत्र भारत में अंग्रेज़ी' केवल या महज़ एक भाषा नहीं है। वह एक तरह की हैसियत या अधिकार सम्पन्नता की ओर इंगित करती है और साथ ही कुछ हासिल करने की बेचैनी का भी बयान करती है। वह हमारी हैसियत से जुड़ी अंतहीन दर्जाबंदियों की बारीक रंगतों का बेहद सटीक हुलिया भी खींचती है। हमारे बाज़ार में सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ भी 'अंग्रेज़ी' ही है। यह एक ऐसी चीज़ है जो इंटरनेट से लेकर, हाइवे पर लगे विज्ञापनों (व्यावसायिक डिप्लोमा और स्वर्ण आभूषणों के साथ); दीवारों पर चस्पाँ विज्ञापनों (सेक्स-क्लीनिकों और शादी करवाने वाले बिचौलियों) तक– हर जगह बेची जाती है।

समकालीन भारत में अंग्रेज़ी एक जटिल और अंतर्विरोधी परिघटना है- वह एक ही समय पर परायी भी है और परिचित भी है, दमन का स्रोत होने के साथ-साथ मुक्ति का गलियारा भी है, उसका औज़ार की तरह भी इस्तेमाल किया जाता है और वह एक प्रतीकात्मक महत्त्व भी रखती है। इसकी कहानी में इतनी परतें और इतनी भिन्नताएँ हैं कि उन्हें किसी एक अनुशासन या विधा में बाँध कर नहीं रखा जा सकता।

मुझे इस बात का एहसास बहुत बाद में जा कर हुआ कि इन कहानियों में एक कहानी मेरी भी हो सकती है। उन दिनों मैं एक अंग्रेज़ीभाषी देश में रह रहा था। कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में पीएचडी के विद्यार्थी और अध्यापन-सहायक के तौर पर अपने पहले ही साल में मेरी भेंट प्रशंसा की इस बौछार से हुई कि मेरी अंग्रेज़ी कितनी अच्छी है। मेरे गुरु लोग, स्नातक बन चुके दोस्त और अभी स्नातक होने की तैयारी में लगे छात्रगण- जिन्हें हम पढ़ाया करते थे, मेरी अंग्रेज़ी को 'धाकड़' और 'प्रचण्ड' आदि कहते थकते नहीं थे। लेकिन खुश होने के बजाय मैं इस प्रशंसा से चिढ़ने लगा। आख़िर में जब यह बात मुझे समझ आयी तब तक मेरी खीझ गुस्से में बदल चुकी थी।

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