राजपूत और मुग़ल:संबंधों का आकलन
Pratiman|July - December 2019
देशज इतिहासकारों की दृष्टि में
विक्रम सिंह अमरावत

राजपूत-मुग़ल संबंधों के बारे में इतिहासकारों के बीच एक नयी बहस ज़ोर पकड़ रही है। इसकी पृष्ठभूमि में 'स्व' और 'अन्य' के बीच में बँटवारा करने वाला वह राष्ट्रवाद है जिसके तहत भारतीय इतिहास के मध्यकाल को पुनर्व्याख्यायित करने की कोशिशें की जा रही हैं। बाह्य दुश्मनों के अतिरिक्त आंतरिक दुश्मनों की खोज में इतिहास का सहारा तो लिया ही जा रहा है, सामाजिक-राजनीतिक संबंधों को भी धार्मिक आधार पर व्याख्यायित करने का प्रयास किया जा रहा है। इस 'स्व' एवं 'अन्य' की व्याख्या का मूल उद्देश्य इतिहास में एक जातीय संघर्ष के अस्तित्व को ढूँढ़ने और उसके चिह्नों को अधिक गहराई से अंकित करना प्रतीत होता है। यह कोशिश अंध-राष्ट्रवाद की विचारधारा के पोषण में सहायक हो सकती है।

संजय लीला भंसाली की फ़िल्म पद्मावत को लेकर जो विवाद हुआ उसमें इतिहास को आधार बना कर राष्ट्रवाद का बाज़ार गर्म किया गया।सीधे तौर पर एक द्विभाजन खड़ा कर दिया गया : राष्ट्रवादी या राष्ट्रविरोधी। इसके तहत 'स्व' एवं 'अन्य' को परिभाषित करके देखा गया और इतिहास के एक विशिष्ट काल एवं विशिष्ट राजनीतिक संबंधों की व्याख्या आजकल प्रचलित किये जा रहे राष्ट्रवाद के संदर्भ में करने का प्रयास किया गया।वास्तव में इस क़वायद का मक़सद इतिहास को अपने निहित स्वार्थ के संदर्भ में व्याख्यायित करना है। मध्यकाल में तेरहवीं सदी के प्रारम्भ से सत्रहवीं सदी के अंत तक उत्तर भारत में पहले तुर्क-अफ़गान सुल्तानों की सत्ता और बाद में मुग़ल बादशाहों का प्रभुत्व रहा। यह सही है कि तुर्क-अफ़गान एवं मुग़ल मूल रूप से उत्तर भारत के नहीं थे, और किसी समय में यहाँ आ कर बसे थे। किंतु यह स्थलांतर और बसावट एक सहज प्रक्रिया की तरह थी और महज़ राजनीतिक प्रभुत्व तक ही सीमित न हो कर एक सांस्कृतिक समन्वय के तहत विकसित हो रही थी। इस अवधि में 'स्व' एवं 'अन्य' के विचार की संरचना समकालीन स्रोतों या समकालीन लेखों के आधार पर ही जानी जा सकती है। लेकिन ऐसी जाँच-पड़ताल करने के बजाय आजकल इस बात को ऐतिहासिक तथ्य की तरह स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है कि ये सभी मुस्लिम शासक हमारे देश में बाहर से आये थे और इसलिए ये हमेशा विदेशी ही रहे हैं और उनको हमेशा विदेशी ही माना गया है। उनके साथ यहाँ के निवासियों एवं शासक वर्ग का हमेशा प्रतिरोध का ही संबंध रहा है और उन्होंने हमेशा यहाँ के निवासियों के साथ 'अन्य' का व्यवहार ही किया है। इस दावेदारी की जाँच के लिए यह जानना बहुत आवश्यक हो जाता है कि समकालीन परिस्थितियों में यहाँ के शासक वर्ग (राजपूत शासक) एवं समकालीन देशज या स्थानीय इतिहासकारों का मुस्लिम शासकों के प्रति क्या सोच था और उनके सोच में 'स्व' एवं 'अन्य' को किस प्रकार से समझा जा सकता है।

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