साकार शिव किसका ध्यान करते हैं?
Akhand Gyan - Hindi|February 2021
जिस आयु में बालक मिट्टी में खेलते हैंउसमें यह श्यामा मिट्टी को भभूति की तरह तन पर रमाकर बड़ेबड़े संन्यासियों जैसे ध्यान कर रहा है! मानो साक्षात् शिव की प्रतिमा हो!... सच! अद्भुत है, मेरा श्यामा!

कैलाश का उत्तुंग शिखर... आज गर्व से और अधिक ऊँचा हो गया था। कारण था वह 'विषय', जिस पर साक्षात् महादेव गीत गा रहे थे। उनके इस गीत को हम 'गुरु-गीता' नाम से जानते हैं। इस गीत की तानों में एक स्थान पर महादेव ने कहा'भवेदनन्तस्य शिवस्य चिन्तनम्'गुरुदेव का चिंतन अनंत स्वरूप शिव का ही चिंतन है। 'अत्रिनेत्रः सर्वसाक्षी... श्री गुरुः कथितः प्रिये'हे प्रिय! गुरुदेव त्रिनेत्ररहित प्रत्यक्षतः शिव ही हैं।

वास्तव में तो गुरु, महाशिव से भी अधिक, महती सत्ता हैं। कारण? क्योंकि महादेव तो केवल सृष्टि या प्राकृतिक शक्तियों के ही लय-विलय का दायित्व निभाते हैं। पर गुरुवर तो एक शिष्य के मन के कुविचारों और कुसंस्कारों के संहारक हैं। उसके जीवन में शवत्व से शिवत्व का संचार करते हैं। कैसे? इस महीन सच्चाई को ठोस रूप से उजागर कर रहा है, यह लेख।

भगवान शंकर का विराट मंदिर...। चहुँ ओर 'ॐ नमः शिवाय' महामंत्र की गूंज! वायुमंडल घंटियों के नाद से तरंगित था। मंदिर के परिसर में एक छोटे से बालक ने प्रवेश किया। उसके संग थी, उसकी माता मुक्ताकेशी। बालक का पूरा नाम थाश्यामाचरण लाहिड़ी।

मंदिर की पवित्र सुरभि से श्यामा अभिभूत था। उसकी आँखें छोटी-छोटी थीं। पर जिज्ञासाओं का कुंड थीं। वह मंदिर की स्थूलता में सूक्ष्मता को ढूँढ रहा था। दृश्यों में अदृश्य को भाँप रहा था। एकाएक उसकी दृष्टि भगवान शिव की मूरत की ओर सरक गई। अनुपम आकर्षण ने उसे बाँध लिया। यह आकर्षण भौतिक चमक या गुलाबी गुलाबों के प्रति नहीं था। वैराग्य के सौन्दर्य ने उसे मोह लिया था। जटाजूट! तन पर रमी भस्म!

साधनस्थ मुद्रा की भव्यता! महादेव के ध्यान की गहराई में मुँदै नेत्र श्यामा को भा गए थे। उनके भाल पर समाई अतुलनीय शांति श्यामा में जिज्ञासाओं की खलबली मचा रही थी। उसने माता मुक्ताकेशी से पूछा'माँ! ये कौन से भगवान जी हैं? ये नेत्र मूंद कर ऐसे क्यों बैठे हैं?' माता मुक्ताकेशी धार्मिक वृत्ति की थी। अपनी पूर्व जानकारी के आधार पर बोली'श्यामा! ये देवाधिदेव भगवान शिव हैं। ये नेत्र मूंद कर ध्यान में लीन हैं।'

श्यामा- माँ! तुम कहती हो कि भक्त ध्यान लगाता है, अपने भगवान को पाने के लिए। पर फिर भगवान किसको पाने के लिए ध्यान कर रहे हैं? भगवान शिव तो स्वयं भगवान हैं! फिर वे किसकी साधना कर रहे हैं?

माँ निरुत्तर हो गई। झुंझलाती हुई बोली'तेरी छोटी सी बुद्धि की ये बड़ी-बड़ी उलझनें मैं नहीं सुलझा सकती। तू शिव जी से ही पूछ, वे ध्यान लगाकर क्या-क्या करते रहते हैं?... और अभी चल, लोटा जल से भर और मेरे साथ कुछ पूजा-अर्चना कर ले।'

कुछ समय के बाद माँ-बेटा वापिस घर लौट आए। पर श्यामा का मन और हृदय वहीं ध्यानस्थ शिव-मूरत के पास छूट गया था। घर के छोटे से मंदिर में स्थापित शिव-मूर्ति के सामने खड़ा होकर वह अक्सर पूछा करता'भगवान जी! आप ध्यान क्यों लगाते हो?'

एक दिन... मुक्ताकशी की साँसें फूल रही थीं। जान साँसत में थी। वह श्यामा को खोज-खोज कर थक गई थी। उसका कुछ अता-पता नहीं था। उसके सारे मित्रों के घर-आँगनों में वह फेरी लगा आई थी। पर श्यामा कहीं नहीं मिला था। दोपहरी के बाद... श्यामा मिला।

मगर किस स्थिति में? गाँव के एक सुनसान क्षेत्र के एक वृक्ष की छाँव में! ध्यान की अवस्था में बैठा हुआ। अपनी देह पर उसने मिट्टी मली हुई थी। नेत्र मूंदे हुए वह गहनता में लीन था। गज़ब का स्वरूप था उसकाइतना दिव्य! इतना भव्य!

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