कभी-कभी ऐसा भी करना चाहिए...
Akhand Gyan - Hindi|January 2021
जीवन में सुलझी राहें हों या उलझे मोड़अपनी सकारात्मकता पर नकारात्मक सोच को, उत्साह पर निराशा को, जिन्दादिली पर बुजदिली को हावी करने में हमेशा हार जाना! पूरी तरह हार जाना!

इस माह 'सफल जीवन के सूत्र' स्तम्भ का यह लेख जिन सूत्रों की विस्तृत जानकारी आपको देगा, वे इस प्रकार हैं ज़िन्दगी में हारना बेहद जरूरी है।साथ ही, आपको गिरना, क्रोध करना, संकोच करना और लालच करना भी आना चाहिए।

इतना ही नहीं, ज़ेन दर्शन के कथनानुसारजो भी करो, पूरी तरह यानी अच्छी तरह करो...। तो इसका मतलब हुआहारो, तो पूरी तरह हारो; संकोच करने में ज़रा-सा भी संकोच मत करो; क्रोध भी अच्छी तरह करो; गिरो, तो शान से गिरो; लोभ भी आधा-अधूरा नहीं, बल्कि भरपूर मात्रा में करो।

चौंकिए मत! न तो आपके पढ़ने में कोई गलती हुई है, न हमारे लिखने में। बस, ठीक से समझने की ज़रूरत है। यह सच है कि हमारे प्रयास हमेशा ऐसे होने चाहिएँ, जो हमें जीवन में जीत दिलाते हों, ऊँचा उठना सिखाते हों, बिना किसी संकोच के मंज़िल तक बढ़ना सिखाते हों, व्यवहार में शालीनता लाते हों और स्वभाव को संयमित बनाते हों।

परन्तु कभी-कभी ज़िन्दगी में कुछ ऐसे भी मोड़ आते हैं, जहाँ ये नकारात्मक पक्ष भी कारगर सिद्ध होते हैं। जहाँ पूरी तरह हारने पर ही जीत मिलती है; पूरी तरह संकोच करने पर ही आत्म-विश्वास आसमान को छू पाता है; अच्छी तरह क्रोध करके सबका हित हो जाता है; ज़्यादा से ज़्यादा नीचे गिरकर, सफलता की ऊँची से ऊँची छलांग लग जाती है और लालच करके व्यक्ति समाज को बहुत कुछ दे जाता है। आइए देखें, कैसे?

गिरो. तो शान से गिरो!

कई वर्ष पूर्व... सैनिकों की एक टुकड़ी किसी बहुत महत्त्वपूर्ण सुरक्षा-क्षेत्र में विशेष प्रयोजन से खुदाई कर रही थी। उनका अफसर लगातार धमकियों की ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसाए जा रहा था'जल्दी करो! तेज़ी से हाथ चलाओ। अगर एक घंटे में काम पूरा नहीं हुआ, तो तुम सबकी खैर नहीं...' तभी घोड़े पर सवार, साधारण वेश-भूषा में एक व्यक्ति वहाँ से गुज़रा। अफसर को यूँ बेवजह बुरी तरह सैनिकों पर जब चिल्लाते हुए सुना, तो रुक गया। अफसर से बोला'अरे भाई! ये लोग तो काम कर ही रहे हैं... तुम काम में इनका हाथ क्यों नहीं बँटा देते? खाली ही तो खड़े हो। तुम्हारा सहयोग समय पर काम खत्म करने में इनकी मदद करेगा...।'

अफसर (हैरानी से- मैं? मैं काम करूँ? जानते हो मैं कौन हूँ? इन सबका कमांडिंग अफसर। मेरा काम काम करना नहीं, इनसे काम करवाना है... इन्हें आदेश देना है और इनका काम है मेरे आदेशों को मानना। अगर तुम्हें मदद करने की ज़्यादा ही उत्सुकता है, तो तुम कर दो! किसने रोका है?

यह सुनना था कि वह व्यक्ति घोड़े से उतरा और सैनिकों के साथ काम में जुट गया। जब तक कार्य पूरा नहीं हुआ, वह उनके साथ खुदाई करता रहा। काम पूरा होने पर उसने सभी सैनिकों से खुशी से हाथ मिलाया और उनकी प्रशंसा की। फिर अफसर के पास जाकर बोला'अगली बार जब तुम्हारा ओहदा तुम्हें मदद करने से रोके, तो मुझे बता देना... मैं हल सुझा दूंगा।'

अब अफसर के होश उड़ गए, क्योंकि ध्यान से देखने पर उसे पता लगा कि सामने खड़ा वह व्यक्ति तो अफसरों का भी अफसर था। अपने ओहदे का कोई अहंकार न करते हुए, विनम्रता का परिचय देने वाले ये सज्जन अमरीका के पहले राष्ट्रपति जनरल जॉर्ज वॉशिंगटन थे।

सफलता का सूत्र- अहंकार के स्तर से (चाहे वह ओहदे का हो या अन्य किसी उपलब्धि या विशेषता का), जो नीचे गिर जाता है, समाज की नज़रों में उसका सम्मान उतना ही ऊँचा उठ जाता है।

हारो, तो पूरी तरह हारो!

एक व्यक्ति फूलों का व्यापार करता था। पीढ़ी दर पीढ़ी उसका परिवार यही काम करता चला आ रहा था। समय के साथ व्यवसाय संभालने वाले चेहरे ज़रूर बदलते चले गए, पर उनकी कमीज़ पर लगे बिल्ले के शब्द ज्यों के त्यों रहे। यह मुहर उनके बिज़नेस की विशेषता थी और सबका आकर्षण-केन्द्र। उस बिल्ले पर अंकित शब्द थे'चीयर्स! बिज़नेस बहुत बढ़िया!'

एक बार बिज़नेस के सिलसिले में एक डीलर उस मालिक से मिलने आया। मीटिंग के बाद, डीलर ने मालिक से पूछा'सर, क्या आपको बिज़नेस में कभी घाटा नहीं हुआ?'

मालिक- हुआ है।

डीलर- क्या कभी मुश्किलों का पहाड़ आपके सिर पर नहीं टूटा?

मालिक- बहुत बार!

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