महारास !
Akhand Gyan - Hindi|December 2020
द्वापर में वृंदावन की गोपियों के पश्चात्ताप और परिष्कार ने कृष्ण को वापिस बुला लिया। हर युग में सत्ता तो वही है। लीला भी वही है। पर क्या हममें ऐसी गोपियाँ हैं? क्या हमारे पश्चात्ताप और पुकार में इतना सामर्थ्य है? इसका आकलन हमें स्वाध्याय करके स्वयं ही करना होगा।

रात्रि ने यह कैसा आँचल फहराया! जो चहुँ ओर कालिमा नहीं, आस्था और प्रेम का प्रकाश नज़र आया। कुंज वन की झूमती लताएँ... पूर्णिमा की चाँदनी से नहा गईं और सकुचाई प्रेमिकाओं की भाँति नज़रें झुकाकर मुस्कुराने लगीं। सरोवरों में खिले कमल पुष्प महक उठे। कलकल करती सरिताएँ भी मनोहर स्वर-लहरियाँ गाने लगीं। शीतल मंद पवन आनंद मनाने लगी।

प्रकृति के इस आनंद का स्रोतवो देखो, कदम्ब की डाल पर झूलता हुआ प्रेमावतारमनमोहन कन्हैया! उसने अपनी बाँसुरी को दोनों करकमलों में पकड़ा और प्यार से सहलाकर अपने होठों से लगा लिया। निर्जीव काष्ठ की बाँसुरी ने पूर्ण चैतन्य का स्पर्श पा लिया। श्री कृष्ण ने बाँसुरी में फूंक मारी। उस निर्जीव काष्ठ की बाँसुरी में मानो अपने ही प्राणों का संचार कर दिया। वह अलौकिक स्वर वृंदावन की वीथियों में लहर बनकर बहने लगा।

गोपियाँ भीग गईं। उनके हृदय वर्षा की प्रथम बूंदों से गीली हुई माटी की भाँति सुवासित हो उठे। बंसी की मधुर ध्वनि का खिंचाव ऐसा हुआ, गोपियाँ प्रेम-सलिलाओं की भाँति अनवरत दौड़ती हुई प्रेम सिंधु की ओर बढ़ने लगीं। प्रेम का यह कैसा दर्शन है! कैसा प्रबल आकर्षण है! मन संभाले नहीं संभल रहा। अरे रोको, कोई रोको इसे!... कहाँ चला यह मन? यह चित्त कहीं खिंचता ही जा रहा है! कदम थम नहीं रहे। नेत्रों में भाव जल सिमट नहीं रहा। हृदयों में प्रेम का उमड़ता तूफान है। रोम-रोम में उफनती थिरकन है! आज परम-शक्ति ने स्वयं को संगीत रूप में व्यक्त किया है। उनकी आत्माएँ नृत्य करने को आतुर कैसे न हों?

शृंगार विहीन काया... अश्रुपूरित नेत्र... वस्त्र-अलंकारों का कोई ध्यान नहीं... न तन की सुधि, न मन की सुधि... चित्त भी वश में नहीं। जो-जो गोपी जो-जो कार्य कर रही थी, उसे बीच में ही त्यागकर बस कृष्ण की ओर दौड़ने लगी। कोई परिवार वालों को भोजन परोसते-परोसते अचानक वन की ओर दौड़ पड़ी। कोई चूल्हे में जलती लकड़ियाँ छोड़कर भाग उठी। कोई बच्चों को सोया हुआ छोड़ आई। कोई तंद्रा की अवस्था में उठकर दौड़ चली। हे भगवान! वृंदावन की वीथियों में तुमने यह कैसा भारी कौतुक किया!

'कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कहाँ हो तुम?'ऐसा पुकारती हुई गोपियाँ कुंज वन में पहुँच गईं। सम्मोहित-सी दशा में, स्वयं को समेटती हुई जब प्रभु के समक्ष पहुँची, तो गिर पड़ीं। ज़ोर-ज़ोर से रुदन करने लगीं। उधर मुरली मनोहर कृष्ण मुस्कुराते ही जा रहे थे, मानो बरसों से इसी क्षण का इंतज़ार कर रहे हों। परन्तु अपने भाव व्यक्त न करते हुए लीलापुरुषोत्तम बोले-

कृष्ण- अरे गोपियो! तुम फिर मेरे पीछे आ गयीं?

गोपियाँ- कृष्ण, तुम बार-बार यही बात क्यों करते हो? देखो, यदि हम न होतीं, तो तुम्हें कौन पूछता?

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