भारोपीय भाषा परिवार, हिंदी और उत्तर-औपनिवेशिकता
Pratiman|July - December 2019
भारोपीय भाषा परिवार, हिंदी और उत्तर-औपनिवेशिकता
समीक्ष्य कृति हिंदी की जातीय संस्कृति और औपनिवेशिकता के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि इसे उत्तर-आधुनिक, सबाल्टर्न और उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के 'सैद्धांतिक निष्कर्षों' के प्रभाव में लिखा गया है।
उदय शंकर

इसका इशारा करते हुए लेखक ने अपनी योजना को इंगित किया है, 'यूरोकेंद्रीयता से बाहर निकलने की जद्दोजहद में उत्तर-उपनिवेशवाद का जन्म हुआ। उत्तर- उपनिवेशवाद ने ज्ञानमीमांसा के क्षेत्र में वि-औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

उत्तर-औपनिवेशिक विमर्शकार रणजीत गुहा भाषाशास्त्र, राजनीतिक-अर्थशास्त्र, यात्रा-संस्मरण, नृविज्ञान, विज्ञान, सामाजिकी, मानविकी, कला जैसे अध्ययन-क्षेत्रों में उपनिवेशवाद की मानसिकता के प्रभाव को रेखांकित करते हुए दर्शन को अलग से उभारते हैं।दर्शन में विवरणों ।घटनाओं के बरअक्स विचार की छूट है।इसीलिए उनके परीक्षण के केंद्र में आते हैं- हिगेल। उनके आते ही दर्शन की यह विशेषता, विवरणों के बरअक्स विचारने की, तर्क द्वारा उपनिवेशवाद की विचारधाराओं और गतिविधियों की लीपापोती का यंत्र बन जाती है। रणजीत गुहा ने हिगेल द्वारा प्रतिपादित विश्व-इतिहास की धारणा को प्रस्तुत किया है।

1986 में प्रकाशित अपनी पुस्तक मार्क्स और पिछड़े हुए समाज में हिंदी के आलोचक और विमर्शकार रामविलास शर्मा ने लिखा है, 'इतिहास-दर्शन (फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ हिस्ट्री) की भूमिका में हिगेल ने तीन तरह के इतिहास-लेखन की चर्चा की है। मौलिक, तथ्यपरक इतिहास घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करता है। चिंतन-प्रधान इतिहास तथ्यों और घटनाओं की व्याख्या करता है। दार्शनिक इतिहास यह सिद्ध करता है कि मानव इतिहास निरपेक्ष विवेक का प्रतिफलन है। हिगेल अपना संबंध इस तीसरी तरह के इतिहास से जोड़ते हैं। उनके लिए विवेक (रीज़न) निरपेक्ष और अनंत ज्ञान है, असीम शक्ति है। मानव-इतिहास द्वारा ईश्वर स्वयं को व्यक्त करता है; वह गुप्त रहस्य न बना रहे, इसीलिए इतिहास द्वारा वह मनुष्य को यह समझने का अवसर देता है कि वह क्या है। वस्तु (मैटर) और चेतना (स्पिरिट) दो भिन्न प्रपंच हैं। वस्तु का सारतत्त्व गुरुत्वाकर्षण है और चेतना का सारतत्त्व स्वतंत्रता है। दर्शनशास्त्र मनुष्य को स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। विश्व इतिहास स्वतंत्रता की पहचान में प्रगति के अलावा और कुछ नहीं है।'

हिगेल की विचार-सरणी में उपलब्ध 'भाववादी भंगिमा' की कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत आलोचनाओं के कुछ टुकड़ों को समेटते हुए रणजीत गुहा अपना स्फटिक विचार स्पष्ट करते हैं कि हिगेल के लिए इतिहास, इतिहास में विवेक है। 'इतिहास के प्रति यह नज़रिया विश्व और उसकी ऐतिहासिकता को निर्मित करने वाले अधिकांश तत्त्वों से किनाराकशी है। यह एक तरह का पृथक्कीकरण है। जहाँ, छंटाई और संरक्षण की संगत अनिवार्य है। यह एक तरह का कथोपकथन है।'

ऊपर-ऊपर देखने से लगता है कि यह विश्व इतिहास-दर्शन के इतने बड़े अग्रदूत (हिगेल) का उत्तर-उपनिवेशवादी विमर्श के अग्रदूत (रणजीत गुहा) द्वारा प्रस्तुत सूक्ष्म दार्शनिक निचोड़ है। जबकि सच्चाई यह है कि गुहा द्वारा हिगेल की विवेच्य पुस्तक फिलॉसफी ऑफ़ हिस्ट्री में ही भौगोलिक अन्यता के विवरण प्रच्छन्न रूप से मौजूद हैं। इन्हीं प्रच्छन्न विवरणों से डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक मार्क्स और पिछड़े हुए समाज के पचासों पन्ने भर जाते हैं। इनमें अफ्रीकी मूल और अफ्रीकी मूल के अमेरिकन, चीनी, भारतीय, अरबी-पारसी लोगों के बारे में 'नस्ली' और 'पूर्वग्रहपूर्ण' टिप्पणियाँ भरी पड़ी हैं। इस तरह रामविलास शर्मा निष्कर्ष निकालते हैं कि 'हिगेल का इतिहास-दर्शन यूरोप-केंद्रित है, नस्लपंथी, गोरी जातियों ख़ासकर जर्मन श्रेष्ठता का क़ायल है, भौगोलिक नियतिवाद का समर्थक है।' 6 उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के अग्रदूत गुहा भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं।'

विश्व में, भारत सहित, इतिहास-लेखन और ज्ञान की सक्रिय धाराओं और प्रणालियों पर हिगेलियन दृष्टि हावी रही है। इसीलिए, उत्तर-औपनिवेशिक अध्येताओं के लिए हिगेल और हिगेलियन-दृष्टि पर कुठाराघात अपने देश और अपनी जातीय ज्ञान-परम्परा को पाना या उसके नज़दीक जाना प्रतीत होता है।

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