आर्थिक सुस्ती या पस्ती ?
Pratiman|July - December 2019
आर्थिक सुस्ती या पस्ती ?
वैकासिक मॉडल के फलितार्थों से फ़ौरी ग़लतियों तक
कंचन शर्मा

भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में आर्थिक प्रश्न तेज़ी से केंद्रीयता ग्रहण करता जा रहा है। सत्ताधारियों की कोशिश है कि राजनीतिक' को 'आर्थिक' से अलग रखा जाए, ताकि आर्थिक संकट की चुनावी अभिव्यक्तियों को प्रबंधित किया जा सके। लेकिन अब इस प्रकार की प्रबंधमूलक चतुराई बहुत देर तक सफल होती हुई नहीं लग रही है।पूरा देश एक बहुआयामी प्रश्न का सामना कर रहा है कि मौजूदा आर्थिक संकट का स्वरूप क्या है, उसके कारण क्या हैं? क्या यह संकट मुख्य रूप से संरचनात्मक और दीर्घकालीन है, या ग्लोबल है, या पिछले छह साल में अपनाई गयी नीतियों के कारण पैदा हुआ है ? हमारे आर्थिक निज़ाम के पास इस तरह के संकट से निबटने की गुंजाइशें कितनी हैं? क्या इस समय अर्थव्यवस्था सुस्त रफ़्तार से होने वाली वृद्धि के दौर से गुजर रही है, या पस्ती के दौर से जिसमें वृद्धि की दर नकारात्मक हो जाती है? अर्थात् यह 'स्लोडाउन' है या 'रिशेसन'? काले धन का चुनावों से क्या ताल्लुक़ है? असंगठित क्षेत्र और संगठित क्षेत्र का समीकरण किस प्रकार का है? क्या व्यवस्था ग़रीबों की आमदनी को गोलबंद करके नियोक्लासिकल आर्थिक निज़ाम के हाथों में थमा देना चाहती है? क्या भारतीय पूँजीपतियों, उनकी औद्योगिक परियोजनाओं और उसके उत्पाद का अंतर्संबंध एक विकृत संबंध है? नोटबंदी और जीएसटी का बढ़ती बेरोज़गारी से क्या रिश्ता है? इन संगीन सवालों पर चर्चा करने के लिए प्रतिमान ने विख्यात अर्थशास्त्री और काले धन की अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ अरुण कुमार, खेतिहर मामलों पर गहरी पकड़ रखने वाले देविंदर शर्मा, वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार टी.के. अरुण और इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉस्ट एकाउंटेंट के चेयरमैन अनिल शर्मा को निमंत्रित किया। चर्चा का संचालन राजनीतिक सिद्धांतकार आदित्य निगम ने किया।

आदित्य निगमः अगर हम चाहें तो मौजूदा आर्थिक संकट के दीर्घकालीन संरचनागत पहलुओं पर नज़र डाल कर चर्चा की शुरुआत कर सकते हैं। इन बातों के बारे में हम पहले से कुछ जानते भी हैं। इसमें कुछ चीजें ऐसी हैं जो पिछली कांग्रेस सरकार (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) के ज़माने से चली आ रही हैं। नव-उदारतावाद के दौर में तक़रीबन यह मान लिया गया था कि आर्थिक नीति का काम बीस करोड़ के बाजार की ज़रूरतें पूरी करना ही है। जाहिर है कि इस तरह के आर्थिक निज़ाम की अपनी सीमा थी। अगर आप आज़ादी के बाद 70-80 फ़ीसदी जनता को बाहर रख कर योजना बनाते हैं तो उससे क्या निकलता है, यह अपने आप में एक सवाल है। फ़िलहाल मैं इसमें नहीं जाना चाहता। बेहतर होगा कि हम अपनी बातचीत पिछले कुछ सालों के अंदर जो हुआ है, उस पर केंद्रित करें। हाँ, यह ज़रूर है कि किसी को अगर दीर्घकालीन पहलुओं पर गौर करना है, तो मैं उस पर बंदिश नहीं लगा सकता। दरअसल, मैं जिस बात को उठाना चाह रहा हूँ, वह पिछले कुछ सालों का नतीजा है।

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