आदिवासी जीवन और वनवासी कल्याण आश्रम
Pratiman|July - December 2019
आदिवासी जीवन और वनवासी कल्याण आश्रम
भारत की जनजातियाँ (आदिवासी) एक समरूप इकाई नहीं हैं। उनकी विविधता वनों पर निर्भरता, आधुनिकता से जुड़ाव, बाहरी संगठनों के प्रभाव, अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता इत्यादि कई आयामों में व्यक्त होती है।
कमल नयन चौबे

भारतीय संविधान में अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों के लिए विशेष प्रावधान किये गये हैं। यह भी सच है कि केंद्र और कई राज्यों की सरकारों ने आदिवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कई कार्यक्रम चलाए हैं। इनकी सफलताओं और विफलताओं पर काफ़ी अध्ययन होते रहे हैं। कई ऐसे गैर-सरकारी संगठन भी हैं, जिन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में काफ़ी काम किया है, और अपनी समझ के अनुसार आदिवासियों के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश की। इनमें कई गाँधीवादी और वामपंथी विचारों से प्रभावित संगठन हैं, जिन्होंने लगातार आदिवासी क्षेत्रों में जागरूकता लाने का काम किया है। इस संदर्भ में माओवादियों ने भी उल्लेखनीय काम किया है, किंतु मैं उनके हिंसक रास्ते को अनुचित मानता हूँ। कुछ ऐसे संगठन भी हैं, जो मुख्य रूप से आदिवासियों के सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन को बेहतर बनाते हैं, और इसके माध्यम से अपने राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास करते हैं। प्रस्तुत शोध-आलेख का लक्ष्य आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले संगठनों की इस तीसरी श्रेणी में आने वाले सर्वप्रमुख संगठन अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यों का आलोचनात्मक अध्ययन करना है। इस शोध-आलेख में यह विश्लेषण किया गया है कि आदिवासी समूहों की अपने स्वायत्त जीवन-शैली को बढ़ावा देने, वन-संसाधनों पर उनके हक़ को सुनिश्चित करने के संदर्भ में आश्रम की नीतियों और कार्यों की क्या भूमिका रही है? वामपंथी रुझान रखने वाले संगठनों की तुलना में आश्रम का दृष्टिकोण और कार्य किस तरह अलग रहा है? इस संदर्भ में विशेष रूप से आश्रम की स्थापना और वनवासी समूहों के अधिकारों के संदर्भ में इसके कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। साथ ही, इसे वामपंथी विचारों को स्वीकार करने वाले एक अन्य संगठन अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी यूनियन के संदर्भ में भी इसे समझने का प्रयास किया गया है।

शोध-आलेख के पहले भाग में आश्रम की स्थापना की परिस्थितियों और इसके बुनियादी लक्ष्यों के बारे में बताया गया है। दूसरे भाग में आदिवासियों की हित रक्षा से संबंधित इसके कार्यों का वर्णन है। इसमें विशेष रूप से पेसा, वन अधिकार क़ानून आदि क़ानून के संबंध में इनके कार्यों का वर्णन किया गया है। शोध-आलेख के तीसरे भाग में अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी यूनियन के गठन और इसके मुख्य लक्ष्यों और रणनीति का विश्लेषण किया गया है, और इस संदर्भ में विशेष रूप से पेसा और वन अधिकार क़ानून के संदर्भ में इनके कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। चौथे भाग में ग्राम्शी द्वारा नागरिक समाज के संगठनों की भूमिका के संदर्भ में अभिव्यक्त विचारों को आधार बनाते हुए भाग में वनवासी कल्याण आश्रण और वन जन श्रमजीवी यूनियन की नीतियों और कार्यों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। आलेख के आख़िरी भाग में इसका निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है।

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वनवासी कल्याण आश्रम : ईसाई मिशनरियों के बढ़ते प्रभाव की प्रतिक्रिया

वनवासी कल्याण आश्रम के बारे में सबसे बुनियादी बात यह है कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आदिवासियों के बीच काम करने वाली शाखा है। यहाँ दो तथ्यों को याद रखने की आवश्यकता है : पहला, संघ आदिवासी या अनुसूचित जनजाति शब्द से ज़्यादा वनवासी शब्द को प्राथमिकता देता है। संघ और आश्रम से जुड़े लोगों का यह मानना है कि आदिवासी शब्द जंगलों और उसके आस-पास रहने वाले समुदायों तथा हिंदू धर्म के बीच पृथकता को दर्शाता है। वहीं वनवासी शब्द यह बताता है कि ये समुदाय हिंदू धर्म का ही हिस्सा हैं और ये वनों या उसके आस-पास के क्षेत्रों में रहते हैं। इसीलिए, आश्रम ने अपने मूल-वाक्य के रूप में यह नारा स्वीकार किया है- 'तू और मैं एक रक्त'। इस शब्द के माध्यम से वे वनवासी लोगों से अपनी एकता दर्शाते हैं। बहरहाल, इस आलेख में मुख्य रूप से आदिवासी शब्द का ही प्रयोग किया है। सिर्फ आश्रम के दस्तावेजों को उद्धृत करते समय ही वनवासी शब्द का प्रयोग किया गया है। दूसरा, आश्रम अखिल भारतीय संगठन होने का दावा करता है, लेकिन कई स्थानों पर यह अन्य गैर-सरकारी संगठनों या संघ की विचारधारा मानने वाले संगठनों के माध्यम से काम करता है।

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