अनवरत शांति और धर्मयुद्ध
Pratiman|July - December 2019
अनवरत शांति और धर्मयुद्ध
स्थायी शांति की सम्भावना में आस्था न रखना मानव स्वभाव की दिव्यता में अविश्वास है।
अशोक बोहरा

मानव इतिहास युद्धों, या युद्ध की धमकियों से भरा पड़ा है। युद्ध विरल न हो कर एक आम बात हो गये हैं। जवाहर लाल नेहरू ने भोपाल के नवाब को नौ जुलाई को लिखे अपने एक पत्र में लिखा, 'अब शांति की कोई सम्भावना नहीं है। ... केवल युद्ध का रास्ता ही बचा है।' युद्धों को रोकने के लिए और शांति की स्थापना के लिए हमें सचेत प्रयास करने पड़ते हैं। यद्यपि युद्ध और अशांति मनुष्यों की नैसर्गिक प्रकृति है, फिर भी शांति के लिए उसे निरंतर प्रयास करते रहना पड़ता है। शांति को बनाए रखना पड़ता है। इस सचेत प्रयत्न के मामले में शांति सत्य जैसी होती है। सत्य को प्रचारित करना पड़ता है, उसे सहारे की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर झूठ बिना सहारे के ही फैल जाता है। झूठ के पंख होते हैं। कहावत है कि जब तक सत्य अपने जूते पहन ही रहा होता है, तब तक झूठ आधी दुनिया में फैल जाता है।' यह सच है कि हम शांति को सदैव बनाए रखना चाहते हैं, किंतु यह भी सच है कि कुछ स्वार्थी तत्त्व निर्दोष नागरिकों पर निरंतर आक्रमण करते रहते हैं और उन्हें और उनके राष्ट्र को 'सुनिश्चित, गम्भीर और दूरगामी' क्षति पहुँचाते रहते हैं। ऐसी स्थिति में अपने बचाव, सम्पत्ति और सम्मान की रक्षा तथा शांतिपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने के लिए हमें ऐसे स्वार्थी तत्त्वों से युद्ध करना पड़ता है। ऐसे युद्ध हम पर थोपे जाते हैं। ऐसे प्रतीकात्मक युद्धों के समर्थन में संत ऑगस्टीन कहते हैं, 'हम शांति की खोज युद्ध करने के लिए नहीं करते, अपितु ऐसे युद्ध करने के लिए हम बाध्य होते हैं ताकि हम शांतिपूर्ण समाज का निर्माण कर सकें। अतः युद्ध की स्थिति में भी शांत रहें,

ताकि आप अपने विरोधियों पर जीत पाकर उन्हें शांतिपूर्ण समाज की सम्पन्नता में शामिल कर सकें। इमानुएल कांट के अनुसार, 'प्रत्येक राज्य या उसके शासक की यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि उसके राज्य में स्थायी शांति बनी रहे।' युरोप के इतिहास में लड़े गये अनेक युद्धों का उदाहरण देते हुए, और अपने समकालीन युरोपीय अनुभव के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि स्थायी शांति की इस इच्छा को पाने के लिए सभी राज्य या सभी राज्याध्यक्ष 'सारे संसार को अपने अधीन करना चाहते हैं।' 1 प्रत्येक राज्य या राज्याध्यक्ष अन्य राज्यों या राज्याध्यक्षों को अपनी ओर झुकाना चाहता है। वह बलपूर्वक उन्हें अपने अधीन करता है, और फिर उस पर अपना आधिपत्य जमा लेता है। संसार पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए पहले तो वह अपने नज़दीकी पड़ोसी राज्यों पर आधिपत्य जमाता है, और अंततः विश्व के अन्य राज्यों पर अपना अधिकार जमा लेता है।

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