नवरात्रि-अपने भीतर जाने के लिये ९-दिवसीय यात्रा
Rishimukh Hindi|October 2020
नवरात्रि हमारी आत्मा को उन्नत करने के लिये मनाये जाते हैं। यह हमारी आत्मा ही है, जो सभी नकारात्मक गुणों (जड़ता, अभिमान, जुनून, राग, द्वेष आदि) को नष्ट कर सकती है। नवरात्रि के दौरान भीतर की ओर मुड़कर और आत्मा से जुड़कर, हम इन नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर कर सकते हैं और हमारे भीतर मौजूद सकारात्मक गुणों का आह्वान कर सकते हैं । इस प्रकार, हम उन्नत और पांतरित अनुभव कर सकते हैं।

नवरात्रि का पर्व आत्म-चिंतन और अपने उद्गम के साथ पुनरू जुड़ने का समय है।

नवरात्रि नौ रातों का त्यौहार है। जिस प्रकार शिव को समर्पित एक रात शिवरात्रि कहलाती है, ठीक उसी तरह नौ रातें शक्ति (दिव्य ऊर्जा) को समर्पित होती हैं और इसे नवरात्रि कहा जाता है। जिस तरह एक बच्चे को पैदा होने में नौ महीने लगते हैं, देवी को आराम करने में नौ दिन लगते हैं और दसवें दिन वो अधिक शक्ति और वीरता के साथ जागती हैं, ताकि बुराई पर विजय प्राप्त की जा सके और अच्छे को फिर से स्थापित किया जा सके।

रात्रि का अर्थ रात है, जो शारीरिक, कारण और सूक्ष्म स्तरों पर तीन तापों (तीन परेशानियों) से राहत देती है। रात हमें इन तीन कष्टों से छुटकारा दिलाती है और मन, शरीर और चेतना को आराम देती है।

यह प्रार्थना और रुपांतरण का समय है। ये नौ दिन माँ के गर्भ से एक बार फिर बाहर आने जैसे हैं, नया जन्म लेने जैसा सृजन अंधेरे में होता है, गर्भ में नौ महीने नौ लंबी रातों की तरह होते हैं जहां आत्मा मानवीय रूप ले लेती है।

यद्यपि हमारा जीवन तीन गुणों द्वारा संचालित है, हम शायद ही कभी उन्हें पहचानते हैं और उन्हें प्रतिबिंबित करते हैं। नवरात्रि के पहले तीन दिन तमो गुण (जड़ता) से, अगले तीन दिन रजो गुण (गतिविधि) और अंतिम तीन दिन सत्त्वगुण (शांति) से जुड़े हैं। हमारी चेतना तमो और रजो गुण से बहती हुई अंतिम तीन दिनों में सत्त्वगुण में खिल जाती है। जब भी जीवन में सत्त्व हावी होता है, विजय अनुसरण करती है। इस ज्ञान के सार को दसवें दिन विजयदशमी के रूप में मनाकर सम्मानित किया जाता है।

नवरात्रि मन को अपने स्रोत पर वापस लाने के लिये मनाया जाने वाला पर्व है

परिवर्तन के इस काल के दौरान, प्रकृति पुराने का त्याग कर पुन: जीवंत हो जाती है। जिस प्रकार सांप अपनी बाहरी त्वचा को निकाल देता है, उसी प्रकार हमें भी अपनी सारी पुरानी चीजों को हटा देना चाहिये और अपनी चेतना को नवीन बनाना चाहिये। वैदिक विज्ञान के अनुसार, तत्त्व वापस अपने मौलिक रूप में जाता है, ताकि स्वयं का बार-बार सृजन कर पाये । यद्यपि नवरात्रि को अच्छाई की बुराई पर विजय के रूप में मनाया जाता है, परन्तु वास्तव में युद्ध अच्छे और बुरे में नहीं होता। वेदान्तिक सृष्टि से, यह परम सत्य की प्रत्यक्ष द्वैतता पर विजय है।

अष्टावक्र के शब्दों में, यह तुच्छ लहर का सागर से अपने अस्तित्त्व को अलग रखने का निष्फल प्रयास है।

देवी को समझना

देवी माँ वह ऊर्जा है जिसने दूरस्थ सूक्ष्म तारों से लेकर सूक्ष्म मस्तिष्क और उसकी भावनाओं सहित संपूर्ण ब्रह्मांड को जन्म दिया है। जिसे 'शक्ति' कहा जाता है, जिसका अर्थ है ऊर्जा, इस सृष्टि के संचलन के लिये देवी माँ भी जिम्मेदार है।

देवी माँ न केवल बुद्धि हैं, बल्कि भ्रान्ति भी हैं। वे न केवल लक्ष्मी है, बल्कि क्षुधा और तृष्णा भी हैं । इस संपूर्ण सृष्टि में माँ की इस छवि का ज्ञान हमें समाधि की गहन अवस्था में ले जाता है । ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म द्वारा हम अद्वैत सिद्धि या पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं ।

नवरात्रि वह समय है जब इस ऊर्जा को जागृत किया जा सकता है। ऐसा करने के तरीकों में से एक देवी माँ के सभी नामों और रूपों की पूजा करना है।

'देवत्व हर जगह है, लेकिन यह सुप्त है। पूजन इसे जागृत करने की प्रक्रिया है।' - गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती

देवी मां या शक्ति के तीन प्रमुख रूप है: रक्षा की देवी दुर्गा, धन की देवी लक्ष्मी, विद्या की देवी सरस्वती। नवरात्रि के नौ रातों और दस दिनों के बीच, इन तीनों रूपों का आह्वान किया जाता है।

नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी के दुर्गा स्वरूप को समर्पित कर मनाये जाते हैं। देवी दुर्गा शक्ति और संरक्षण का प्रतिनिष्टित्व करती हैं। उसकी उपस्थिति में, नकारात्मक शक्तियां नष्ट हो जाती हैं। वह नकारात्मकता को सकारात्मकता में रुपांतरित कर देती हैं।

दुर्गा को 'जया दुर्गा' भी कहा जाता है, वह जो विजय दिलाती है। जब आप दुर्गा से प्रार्थना करते हैं, तो वह चीजों को आगे बढ़ाने के लिये आप में गतिशीलता लाती है।

दुर्गा मंत्र हमारी इच्छा शक्ति और रचनात्मक शक्ति को मजबूत करता है, और हमें कठिन परिस्थितियों को सहन करने में भी सहायता करता है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

भावार्थ: उस परम देवी को प्रणाम, प्रणाम और प्रणाम, जो सभी प्राणियों में आंतरिक शक्ति के रूप में विद्यमान हैं।

नव दुर्गा : नव दुर्गा शक्ति के नौ रूपों को संदर्भित करती है जो सभी नकारात्मकताओं को दूर करने के लिये कवच का काम करती है। देवी के इन गुणों के स्मरण मात्र से सभी मानसिक अवरोध दूर हो सकते हैं। इन नामों का जप आपकी चेतना को उन्नत करता है और आपको अधिक केंद्रित, साहसी और रचनात्मक बनाता है। यह चिंता, आत्म-संदेह और भय से ग्रसित लोगों के लिये विशेष रूप से फायदेमंद है।

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