भगवद् गीता-दिव्य गान
Rishimukh Hindi|October 2020
ब्रह्मांड चेतना की एक शानदार अभिव्यक्ति है। यहां जो कुछ भी आप देख रहे हैं, वह और कुछ नहीं है, बल्कि चेतना की अपनी संपूर्ण कांति के साथ अभिव्यक्ति है। अपनेपन का बोध, जिस की अनुभूति हर वस्तु और हर जीव को होती है, कुछ और नहीं बल्कि उस ‘संपूर्ण' का एक भाग है। गीता इसी से शुरू होती है ...
गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी

जब कुरुक्षेत्र में सभी शंख फूंक दिये गये, तो अर्जुन ज्ञान का जिज्ञासु' के रूप में जागा। ज्ञान के स्वरूप, भगवान श्री कृष्ण ने जो कुछ भी हो रहा था, उस पर निष्पक्ष द्रष्टा के रूप में दृष्टि डाली।

अर्जुन विषाद योग

ब्रह्मांड चेतना की एक शानदार अभिव्यक्ति है। यहां जो कुछ भी आप देख रहे हैं, वह और कुछ नहीं है, बल्कि चेतना की अपनी संपूर्ण कांति के साथ अभिव्यक्ति है। हर वस्तु की रचना आपको यह याद दिलाने के लिये है कि जिस चेतना ने वस्तु का निर्माण किया है वह इस अस्तित्व का आधार है और वह कांतिपूर्ण है। भारत तेजस्विता का प्रतीक है। महाभारत का अर्थ है 'महा तेज'। महा तेज एक गीत के रूप में झलकता है, जिसमें एक लय है। और यह गीत है : भगवद् गीता।

भगवद् गीता का अर्थ है : दिव्य गान । जब युद्ध होता है, तो कोई गा नहीं सकता है। युद्ध का सीधा अर्थ होता है वैमनस्य । संगीत सामंजस्य का प्रतीक है। युद्ध के मैदान पर ज्ञान दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। जबकि, ज्ञान वहाँ सबसे अधिक आवश्यक है। वहाँ ज्ञान आवश्यक है, परंतु इस ज्ञान को, किसी महल या किसी निश्चल, शांत स्थल की अपेक्षा युद्ध के मध्य लाना, ईश्वर का ही तेज है। सामंजस्य को वहाँ लाना, जहाँ इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, ईश्वरीय प्रतिभा ही है। युद्ध के मैदान में आत्मा के विषय में बोलना और गाना किसी चमत्कार से कम नहीं है! और ऐसा होना केवल ईश्वर की अभिव्यक्ति ही हो सकती है। जो युद्ध के मैदान में जीवन के ज्ञान को सामने लाता है, सत्य को स्पष्ट करता है, वह अनन्त स्वरूप है।

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