गणेश का विलक्षण स्वरुप
Jyotish Sagar|September 2021
गणेश भी वैदिक देवता हैं, किन्तु इनका नाम वेदों में गणेश न होकर 'ब्रह्मणस्पति' है। जो वेद में 'ब्रह्मणस्पति' के नाम से अनेक सूत्रों में अभिहित किए गए हैं।
डॉ. हनुमान प्रसाद उत्तम

गणपतित्व निरूपण करने के पूर्व ही गणेश के वैदिकत्व के विषय में सामान्य चर्चा कर देना जरूरी प्रतीत होता है। यह तो सर्वमान्य सिद्धान्त माना जाता है कि ऐतिहासिक दृष्टि से विकास सिद्धान्त के अनुसार अक्सर सभी पौराणिक देवताओं का मूलरूप बेद में मिलता है। धीरे-धीरे ये विकास को प्राप्त होकर कुछ नबीन रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। गणेश भी वैदिक देवता हैं, किन्तु इनका नाम वेदों में गणेश न होकर 'ब्रह्मणस्पति' है। जो बेद में 'ब्रह्मणस्पति' के नाम से अनेक सूत्रों में अभिहित किए गए हैं, बाद में पुराणों में उन्हीं देवता का नाम 'गणेश' मिलता है। ऋग्वेद के द्वितीय मंडल का यह सुप्रसिद्ध मन्त्र गणपति की ही स्तुति हैं:

'गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कवि

कवीनामुपमश्रवस्तमम्।

ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आन:

शृण्वन्नूतिभिः सीद

सादनम्।।'

ब्रह्मन का आशय बाकूवाणीहै। 'ब्रह्मणस्पति' का आशय वाकूपति-वाणी का स्वामी हुआ। 'बृहदारण्यक उपनिषद्' में ब्रह्मणस्पति का यही आशय प्रदर्शित किया गया है।

वैसे, गणपति' का आशय है-'गणों का स्वामी।' इसी आशय में गणों के ईश होने से इन्हें गणेश भी कहते हैं। यहाँ 'गण' शब्द का आशय जानना जरूरी है। गण समूहे' इस समूहबाचक गण धातु से 'गण' शब्द बना है। इसलिए इनका सामान्यार्थ समूह-समुदायत्व होता है, किंतु यहाँ पर इसका आशय देवताओं का गण, महतत्व, अहंकारादि तत्त्वों का समुदाय और सगुण-निर्गुण ब्रह्मपण है। इसलिए गणपति शब्द से यह सूचित होता है कि आप सभी देवताबूंद के रक्षक हैं, महतत्त्व आदि जितने सृष्टि-तत्त्व हैं, उनके भी आप स्वामी हैं अर्थात् इस जगत् का उद्भव इन्हीं से हुआ है। सगुण-निर्गुण ब्रह्म समुदाय के पति होने से गणपति ही इस जगत् में सबसे श्रेष्ठ और माननीय देवाधिदेव हैं। 'गण' की दूसरी व्याख्या से आपका जगत्कर्तृत्व और भी ज्यादा रूप से स्पष्ट प्रतीत होता है। मनोवाणीमय सकल दृश्यादृश्य विश्व का बाचक 'ग' अक्षर है और मनोबाणीविहीन रूप का ज्ञान 'ण' अक्षर कराता है। इस प्रकार 'गण' शब्द के द्वारा जितना मनोवाणी समन्वित और तद्विरहित जगत् है, सबका ज्ञान हमें होता है। उसके पति ईश होने के कारण हमारे आराध्य गणेश सर्वतोमहान देव है।

गणपति का मुख हाथी का बतलाया जाता है। इसी से उन्हें 'गजानन', 'गजास्य', 'सिंधुरानन' आदि नामों से अभिहित किया जाता है। इस विचित्र रूप के लिए पुराण में समुचित कथानक भी वर्णित है, किन्तु इस रूप के द्वारा जिस अव्यक्त भावना को व्यक्त रूप दिया गया है वह नितांत मनोरम है। गणपति में अंतर्निहित गूढ आध्यात्मिक तथ्य को जिस ढंग से इस रूप के द्वारा सर्वजनसंबंध बनाने की कल्पना की गई है, वह वास्तव में बेहद सुन्दर है। गणपति के बाह्य रूप को समझना क्या है, उनके आभ्यंतर गुहास्थित सत्य रूप की पहचान करना है। उनके रहस्य जानने के लिए यह बड़ी भारी मूल्य वाली कुंजी है।

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