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खेल के मैदान में कृत्रिम मेधा का दखल
Jansatta
|August 06, 2025
आज खिलाड़ी की तंदरुस्ती का स्तर, हृदयगति, थकान, नींद का चक्र और यहां तक कि उसकी मानसिक स्थिति भी तकनीकी उपकरणों और साफ्टवेयर से मापी जाती है। अब भारत में कुश्ती, कबड्डी और एथलेटिक्स जैसे पारंपरिक खेलों में भी यह तकनीकी हस्तक्षेप दिखाई देने लगा है।
भारत में खेलों की परंपरा सदियों पुरानी है। किसी गांव के धूल भरे अखाड़े से लेकर शहर के चमचमाते सिंथेटिक ट्रैक तक, हमारी साझी स्मृति में पसीने की गंध और माटी की सोंधी खुशबू बराबर रची-बसी है।
मगर पिछले कुछ वर्षों में इस पारंपरिक दृश्य के सामने एक नई रोशनी चमकी है, जैसे स्क्रीन, स्मार्ट रीडर और कलाइयों में लिपटी स्मार्ट-बैंड। बीते कुछ वर्षों में खेल का मैदान केवल खिलाड़ियों की मेहनत और अभ्यास का अखाड़ा नहीं रहा, बल्कि अब यह तकनीक की प्रयोगशाला बनता जा रहा है। जहां पहले एक कोच की आंख और खिलाड़ी की संवेदनाएं प्रदर्शन को मापती थीं, वहीं आज कृत्रिम मेधा (एआइ) की आंखें, डेटा विश्लेषण और आधुनिक तकनीकी उपकरण खेल के हर पल को बारीकी से पकड़ते हैं। ऐसे में उभरती खेल शक्ति के रूप में भारत के लिए यह बदलाव का अवसर भी है और चुनौती भी। खिलाड़ी के शरीर का हर सूक्ष्म कंपन अब डेटा है, जिसे 'एल्गोरिदम' पलक झपकते पढ़ लेते हैं।
हाल ही में जारी हुई 'इंडिया एआइ मिशन और राष्ट्रीय खेल नीति-2025' ने इस बदलाव को संस्थागत जामा पहना दिया है। खेल नीति दरअसल तीन बड़े वादों पर टिकी है। पहला, जनभागीदारी- मतलब हर बच्चे को कम से कम एक खेल से जोड़ना। दूसरा, उच्च प्रदर्शनयानी वर्ष 2036 के ओलंपिक तक भारत पदकों की दहलीज पर खड़े रहने के बजाय ऊपर की सीढ़ियां चढ़े। तीसरा, खेल उद्योग का विकासयानी खेल को करिअर, बाजार और नवाचार का पूर्णकालिक तंत्र बनाना। इन तीनों वादों को गति देने के लिए खेल नीति में कृत्रिम मेधा को ईंधन मान लिया गया है, जैसे किसी रथ को तीन घोड़े खींच रहे हों और कृत्रिम मेधा उनकी लगाम थामे सारथी हो। विद्यालयों में तंदरुस्ती संबंधी आंकड़े एकत्र करना, राज्यों में खेल विज्ञान केंद्र खोलना और निजी क्षेत्र को कर-रियायत देकर नवाचार की राह चौड़ी करना, ये सब उसी विचार-श्रृंखला का हिस्सा हैं।
This story is from the August 06, 2025 edition of Jansatta.
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