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तबाही के मंजर
Outlook Hindi
|June 09, 2025
चार दिन की लड़ाई में भारी गोलाबारी से एलओसी के आसपास के गांवों में बर्बादी की मौके से रिपोर्ट
नरगिस बेगम के चेहरे से खून टपक रहा था। उनकी 21 साल की बेटी सनम बशीर ने उन्हें अपनी बाहों में भरे उनकी नब्ज पर हाथ रखा और राहत महसूस की, लेकिन ज्यादा देर तक नहीं। जल्द ही 45 वर्षीय नरगिस ने दम तोड़ दिया। उन्हें पाकिस्तानी मोर्टार शेल के छर्रे लगे थे, जो 8 मई की रात को जम्मू-कश्मीर की उड़ी तहसील में राजरवानी के उनके घर से बाहर निकलते ही उनके पास फटा था। नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार से तोपखाने की गोलाबारी में ग्रामीणों के घर निशाना बनाए गए थे।
गोलाबारी शुरू हुई तो 8 मई की रात गांव के गांव खाली हो गए। लोग जान बचाने के लिए घरों को छोड़ सुरक्षित जगह की ओर जा रहे थे। नरगिस के रिश्तेदार अल्ताफ हुसैन खान बताते हैं, “रात करीब 8.30 बजे गोलाबारी शुरू हुई और एक गोला उस वाहन के पिछले हिस्से पर लगा जिसमें नरगिस अपने रिश्तेदारों के साथ बारामूला जा रही थीं।” उनके पति बशीर अहमद खान तबसे सदमे में हैं।
पाकिस्तान की गोलाबारी से अब तक नरगिस और कम से कम 22 दूसरे लोगों की मौत हो चुकी है। उनमें भारतीय सेना का एक जवान और सीमावर्ती शहर पुंछ में एक अतिरिक्त जिला विकास आयुक्त भी हैं। वहां सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की बौछार भी हुई।
दो दिन बाद, 10 मई की शाम को संघर्ष विराम का ऐलान सनम के परिवार जैसों के लिए राहत की तरह आया, जो एलओसी या अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास रहते हैं। पुंछ के मेंढर शहर के हबीबुल्लाह खान कहते हैं, “हमारे इलाके में भारी मोर्टार गोलाबारी से जानमाल का नुकसान सबसे ज्यादा हुआ। सुबह गोलाबारी बंद हो गई, लेकिन हमें डर था कि शाम को फिर से शुरू हो जाएगी। जंगबंदी राहत लेकर आई है।” उन्हें उम्मीद है कि यह टिकाऊ होगी।

This story is from the June 09, 2025 edition of Outlook Hindi.
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