देवताओं का मिलन-पर्व है कुल्लू दशहरा
Jyotish Sagar|October 2020
देवताओं का मिलन-पर्व है कुल्लू दशहरा
अद्भुत लोक संस्कृति के प्रदेश हिमाचल में साल भर कोई न कोई लोक-उत्सव आयोजित होता ही रहता है। यहाँ के अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट परम्पराएँ, रीति-रिवाज, बोलियाँ तथा वेशभूषाएँ हैं, किंतु अपने लोक-उत्सव के प्रति आस्था तथा उमंग प्रत्येक के मन में समान रूप से परिलक्षित होती है।
डॉ.हनुमान प्रसाद उत्तम

जितना प्राचीन यहाँ का इतिहास है उतने ही पुराने हैं यहाँ के मेले एवं त्योहार। यहाँ का हर लोक-उत्सव अपने क्षेत्र की विशिष्ट लोकसंस्कृति एवं इतिहास का परिचायक है। नैसर्गिक सुन्दरता से परिपूर्ण कुल्लू घाटी में बसंत के आगमन के साथ ही लोक-उत्सवों की एक शृंखला आरम्भ हो जाती है। इस शृंखला का प्रमुख मेला है 'कुल्लू दशहरा'। जब देश के अन्य भागों में दशहरा समाप्त होता है, तो कुल्लू घाटी दशहरा शृंखला हो जाता है, जो घाटी के अनेक ग्राम देवताओं का मिलन-पर्व भी कहलाता है। कुल्लू दशहरा का यह रोचक पहलू है कि इसमें रामलीला का मंचन नहीं होता है। इस उत्सव में तो पालकियों में सजे-धजे देवी-देवता पधारते हैं, जो भगवान् श्री रघुनाथ जी की रथयात्रा में शामिल होते हैं। किसी समय इस रथ यात्रा में 365 देवी-देवता पधारते थे, किन्तु अब यह संख्या कुछ कम हो गई है। प्रत्येक ग्राम देवता के साथ कार्यकर्ता, गूर (देवता का प्रवक्ता) तथा वाद्य यंत्र दल होता है। आयोजन समिति द्वारा इन्हें नजराना दिया जाता है। यह नजराना नकद राशि के रूप में होता है तथा उस देवता के स्तर एवं प्रतिष्ठा के अनुसार दिया जाता है।

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