भरत जी की चित्रकूट यात्रा

Jyotish Sagar|July 2020

भरत जी की चित्रकूट यात्रा
गंगातट पर चल रही रामकथा में 20वें दिन की कथा को श्रोतागण पूर्ण एकाग्रता से सुन रहे हैं। सुनें भी क्यों न? एक ओर तो जहाँ भरत जी की चित्रकूट यात्रा का मार्मिक प्रसंग है, तो वहीं दूसरी ओर व्यास पीठ पर विराजमान स्वामी जी की शैली ही ऐसी है कि सभी प्रकरण मनोहारी प्रतीत होते हैं।

भ्रातृप्रेम का यह अद्भुत प्रसंग भी स्वामी जी की वाणी से और भी मन को छू लेने वाला बन गया है। पाण्डाल भरा हुआ है। सभी श्रोता शान्त भाव से कथा का आनन्द ले रहे हैं। भरत जी के आने का समाचार मिलने से लक्ष्मण जी क्रुद्ध हो रहे हैं। इस प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए स्वामी जी कहते हैं कि “लक्ष्मण जी भरत जी के सम्बन्ध में कह रहे हैं कि 'यदि इनके हृदय में कपट और कुचाल न होती, तो रथ-घोड़े और हाथियों की कतार ऐसे समय किसे सुहाती, परन्तु भरत को ही व्यर्थ कैसे दोष दे सकते हैं? राजसत्ता पाने पर पूरा संसार ही पागल हो जाता है। चन्द्रमा गुरु पत्नीगामी हुआ। राजा नहुष ब्राह्मणों की पालकी पर चढ़ा और राजा वेन के समान नीच तो कोई और नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनों से विमुख हो गया। सहस्रबाहु, देवराज इन्द्र, त्रिशंकु आदि किसको राजमद ने कलंकित नहीं किया? भरत ने यह उपाय उचित ही किया है कि :

जौं जियँ होति न कपट कुचाली।

केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।

भरतहि दोसु देई को जाएँ।

जग बौराइ राज पदु पाएँ।।

ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ

भूमिसुर जान।

लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन

समान।।

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू।

केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।

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