भरत जी की चित्रकूट यात्रा

Jyotish Sagar|June 2020

भरत जी की चित्रकूट यात्रा
श्रीरामचन्द्रजी पुनः सोच में पड़ गए कि भरत के आने का क्या कारण है? फिर किसी ने आकर कहा कि उनके पास में बड़ी भारी चतुरंगिणी सेना भी है।

गंगातट पर चल रही रामकथा में भरतजी की चित्रकूट यात्रा का मनोहारी प्रसंग चल रहा है, जिसे स्वामी जी भाव विभोर होकर सुना रहे हैं। श्रोतागण भी पूर्ण मनोयोग से उस अद्भुत भ्रातृप्रेम के प्रसंग को सुनते हुए ऐसा अनुभव कर रहे हैं, जैसे भरत जी की यात्रा को वे स्वयं अपनी आँखों से देख रहे हों। भरत जी को यमुनातट पर पहुँचते-पहुँचते साँझ हो गई, फलतः उन्होंने वहीं रात्रि विश्राम किया।

स्वामी जी कहते हैं “भरत जी सहित सभी को चित्रकूट पहुँचने की शीघ्रता थी। सभी की भरत जी के समान ही श्रीराम के दर्शन की अभिलाषा थी। तुलसीदास जी कहते हैं, सभी को मंगल शकुन हो रहे हैं, पुरुषों के दाहिने तथा स्त्रियों के बायें नेत्र और भुजाएँ फड़क रही हैं। अयोध्यावासी सहित भरत जी को अत्यधिक उत्साह है कि श्रीराम जी मिलेंगे और सभी समस्याओं का अन्त हो जाएगा। निषादराज ने उसी समय दूर स्थित कामदगिरि पर्वत को दिखाया और कहा कि उसी पर्वत के निकट ही पयस्वनी नदी के तट पर श्रीराम-सीताजी एवं लक्ष्मण जी सहित निवास करते हैं। सब लोग उस पर्वत को देखकर जय घोष करने लग जाते हैं, 'जानकी जीवन श्रीरामचन्द्र की जय हो!' साथ ही दण्डवत् प्रणाम करते हैं। सब इतने हर्षित हो जाते हैं जैसे कि श्रीराम मिल गए हों और अयोध्या के लिए लौट रहे हों।

देखि करहिं सब दंड प्रनामा।

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