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प्रेम और भक्ति की अनन्य प्रतीक 'श्रीराधा'

Jyotish Sagar

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September 2024

कृष्ण चरित के प्रतिनिधि शास्त्र भागवत और महाभारत में राधा का उल्लेख नहीं होने के बावजूद वे लोकमानस में प्रेम और भक्ति की अनन्य प्रतीक के रूप में बसी हुई हैं। सन्त महात्माओं ने उन्हें कृष्णचरित का अभिन्न अंग माना है। उनकी मान्यता है कि प्रेम और भक्ति की जैसे कोई सीमा नहीं है, उसी तरह राधा का चरित, उनकी लीला और स्वरूप भी प्रेमाभक्ति का चरमोत्कर्ष है।

- डॉ. हनुमान प्रसाद उत्तम

प्रेम और भक्ति की अनन्य प्रतीक 'श्रीराधा'

भागवत मर्यादित भक्ति का शास्त्र है। इसलिए प्रकट रूप में वहाँ राधा का उल्लेख नहीं आया है, लेकिन शाक्त पुराण देवी भागवत ने उस अभाव की पूर्ति कर दी है। वहाँ धा की शक्ति के रूप में उल्लेख कृष्ण किया गया है। इस पुराण के अनुसार राधा केवल राजा वृषभानु की पुत्री ही नहीं हैं, वे पराशक्ति की अवतार हैं। ठीक उसी तरह जैसे कृष्ण परमात्मा के अवतार हैं। वहाँ आद्या प्रकृति के पाँच रूप हैं— दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री (देवीभागवत 9/1/1)। शौर्य, प्रेम, समृद्धि, विद्या और निष्ठा के प्रतीक इन रूपों में शाक्त दर्शन की बीज रूप में प्रतिष्ठा की गई है।

उल्लेखनीय है कि इन पाँच रूपों में से तीन दुर्गा, राधा और सरस्वती अविवाहित हैं। पाँचों प्रकृति के पाँच स्वरूप हैं।

राधा इनमें जगत के नियन्ता की चिदशक्ति हैं। वैदिक और पौराणिक साहित्य में, राधा और इस धातु के अन्य रूप 'राधा' का अर्थ है पूर्णता, सफलता और सम्पदा। यह शब्द अथर्ववेद, तैत्तिरीय ब्राह्मण और संहिता में मिलता है। भक्ति शास्त्र के अनुसार इस तरह राधा का उल्लेख बीज रूप में आ जाता है। भागवत् और महाभारत आदि ग्रन्थों में राधा का उल्लेख अलग-अलग कारणों से नहीं होने की मान्यता है, लेकिन उन्हें कृष्ण की अभिन्न सहचरी की रूप में कहीं भी अमान्य नहीं किया गया।

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