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कल्पवृक्ष है गुरु भोग से मुक्ति तक सब है सुलभ
Jyotish Sagar
|July 2026
राजा जनक ने अष्टावक्र से कई तरह की जिज्ञासाएँ की और अष्टावक्र ने अपने ज्ञान से उनका समाधान किया। जनक ने अष्टावक्र को गुरु के रूप में कल्पवृक्ष मान लिया।
मानव जीवन को गरिमा प्रदान करने के लिए दो वस्तुएँ नितान्त आवश्यक हैं—प्रथम तपस्या का बल और द्वितीय साधना की शक्ति। इन दोनों महान् गुणों की दक्षता गुरु दीक्षा से ही सम्भव होती है। कल्याण के इच्छुक को सर्वप्रथम अपने सद्गुरु से दीक्षित होना चाहिए। 'दीक्षा' का अर्थ है किसी निश्चित लक्ष्य की पूर्ति के लिए पूर्ण रूप से संलग्न होना।
भगवान् की कृपा से जीव को मानव शरीर मिलता है और गुरु कृपा से भगवान् मिलते हैं। लोग समझते हैं कि जब हम गुरु बनाएँगे, तभी वे अपनी कृपादृष्टि रखेंगे, परन्तु यह कोई महत्त्व की बात नहीं है। अपने-अपने बालकों का सभी पालन-पोषण करते हैं, परन्तु गुरुकृपा विलक्षण होती है। दीन-दुःखी को देखकर गुरु का हृदय द्रवित हो जाता है। गुरु सभी पर कृपादृष्टि रखते हैं, परन्तु परमतत्त्व का जिज्ञासु भी उस कृपा को ग्रहण करता है, जैसे प्यासा आदमी जल को ग्रहण करता है। वास्तव में अपने उद्धार की इच्छा जितनी तेज होती है, सत्य तत्त्व की जिज्ञासा जितनी तीव्र होती है, शिष्य पर सन्त-कृपा अथवा गुरु-कृपा अपने आप होती है। गुरु-कृपा होने पर फिर कुछ बाकी नहीं रह जाता। परन्तु ऐसे गुरु बहुत दुर्लभ होते हैं।
पारस पत्थर से लोहा भी सोना बन जाता है, परन्तु उस सोने में यह ताकत नहीं होती कि दूसरे लोहे को भी सोना बना दे। 'गुरु कृपा' से शिष्य भी 'गुरु' बन जाता है, 'महात्मा' बन जाता है।
This story is from the July 2026 edition of Jyotish Sagar.
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