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वैश्विक ताप से बढ़ती जटिलताएं
Jansatta
|January 07, 2026
दुनिया के ताकतवर देशों को वैश्विक ताप को लेकर कोई चिंता नहीं। आधुनिकीकरण के दौर में लगातार पहाड़ काटे जा रहे हैं। खनन के लिए किए जा रहे विस्फोटों से पहाड़ दरक रहे हैं। मनुष्य की जिंदगी अनिश्चित हो गई है। स्थिति को संभालने के लिए सही दिशा में प्रयास जरूरी हैं।
वैसे तो कई देशों में प्रदूषण संकट गहरा गया है, लेकिन भारत में इसकी चुनौतियां बेहद गंभीर रूप ले चुकी हैं। पिछले दिनों पर्यावरण और प्रदूषण पर 'लैंसेट' का एक सर्वेक्षण आया। इसके बाद मानसिक रोगियों की देखभाल करने वाली एक संस्था 'इमोनीड्स' का भी एक सर्वेक्षण जारी हुआ। इन दोनों ही सर्वेक्षणों ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। विशेष रूप से भारत के लिए यह चिंता की बात है, जहां विकास के समांतर न तो पर्यावरण को बचाने की फिक्र है और न प्रदूषण को नियंत्रित करने के गंभीर प्रयास दिखते हैं।
ये सर्वेक्षण बता रहे हैं कि वायु गुणवत्ता सूचकांक का लगातार 400 से ऊपर रहना, न केवल लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि इसने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को भी जोखिम में डाल दिया है। अब बच्चे भी खतरे में हैं। वहीं लोगों में स्मृति संबंधी विकार बढ़ा है। इसके अलावा जहरीली हवाओं के लगातार बने रहने से कई बीमारियां पैदा हो रही हैं।
सर्वेक्षण बता रहे हैं कि प्रदूषण से न केवल सांस लेने में दिक्कत हो रही है, बल्कि हृदय और एलर्जी संबंधी समस्याएं भी लोगों को हो रही हैं। अल्जाइमर और पार्किंसन की चपेट में भी लोग आ रहे हैं। सर्वेक्षण में भारतीयों की मुश्किलों का भी जिक्र है। कहा गया है कि इस प्रदूषण ने लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटा दी है और अब हालत ऐसी हो गई है कि एंटीबायोटिक दवाइयां भी कम असर कर रही हैं। देश में निरंतर बढ़ते प्रदूषण के कारण ऋतु चक्र में असाधारण बदलाव आया है। बढ़ते वैश्विक ताप की वजह से जटिलताएं बढ़ रही हैं। बर्फ गिरने की प्रकृति बदल रही है। हिमनद हमारे जलस्रोत हैं। ये नदियों को पानी और बादलों को घुमड़न देते हैं। खेतों में फसलों को जीवन भी मिलता है। मगर अब बर्फ कम पड़ रही है और जो हिमनद बनते हैं, वे जल्दी पिघलने लगते हैं। इसी कारण बाढ़ के खतरे बढ़ गए हैं और लोगों का जीवन अनिश्चित हो गया है। जलवायु संकट की यह भयावह तस्वीर है।
Esta historia es de la edición January 07, 2026 de Jansatta.
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