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नवजात को प्रदूषण से बचाएं बनाएं सुरक्षित 'एयर बबल'
Grehlakshmi
|December 2025
बढ़ते वायु प्रदूषण ने आज नवजात शिशुओं की पहली सांस तक को असुरक्षित बना दिया है। नाजुक फेफड़ों वाले ये छोटे बच्चे धूल, धुएं और जहरीले कणों के बीच जीने को मजबूर हैं। माता-पिता के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती है- अपने बच्चे को इस अदृश्य खतरे से बचाना।
देश की हवा में बढ़ते जहरीले कण आज नवजात शिशुओं के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। जन्म लेते ही जिन बच्चों को पहली सांस में शुद्ध हवा मिलनी चाहिए, वे धुएं, धूल और पी.एम. 2.5 जैसे सूक्ष्म विषैले कणों को अपने नाजुक फेफड़ों में भरने को मजबूर हैं। नवजात शिशुओं की सांस नलियां बेहद संवेदनशील होती हैं, इसलिए प्रदूषण का हर कण उन पर कई गुना ज्यादा असर डालता है। इसी कारण तेज सांस, खांसी, सीने में जकड़न और संक्रमण का खतरा इन दिनों तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ता प्रदूषण हमारी आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य पर गहरा और दीर्घकालिक असर छोड़ रहा है।
अक्सर हम यह नहीं समझ पाते कि रोजाना होने वाली थकान, खांसी, आंखों में जलन, सांस फूलना या सिरदर्द की असली वजह हवा में बढ़ा प्रदूषण है। इस प्रदूषण का सबसे गंभीर असर उन पर पड़ रहा है जो हमारी दुनिया में आए ही अभी हैं। जन्म के समय उन्हें जो पहली सांस मिलनी चाहिए वह शुद्ध हवा होनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से आज उनकी पहली ही सांस प्रदूषित हवा में जा रही है। दिल्ली का हाल तो दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया है। एयर क्वालिटी इतनी खराब है कि एम्स के विशेषज्ञ डॉक्टर तक कह चुके हैं- 'दिल्ली की हवा में रहना सुरक्षित नहीं है।' विकास के नाम पर ऊंची-ऊंची इमारतें तो बन रही हैं, लेकिन उनमें रहने वाले लोग रोज अपने फेफड़ों में जहर भरने पर मजबूर हैं। पर्यावरण दिन-ब-दिन दम तोड़ रहा है और इंसानी जिंदगी मुश्किल होती जा रही है।
कमजोर प्रतिरोधक क्षमता पर हमला
नवजात शिशु का इम्यून सिस्टम बहुत संवेदनशील होता है। उनका शरीर बाहरी वातावरण के खिलाफ लड़ने के लिए अभी तैयार नहीं होता। ऐसे में जब प्रदूषण का स्तर 'सीवियर' श्रेणी में पहुंच जाता है, तो यह बच्चों के लिए कई गुना खतरनाक साबित होता है।
हवा में मौजूद वायरस और बैक्टीरिया उन्हें सबसे जल्दी प्रभावित करते हैं।
This story is from the December 2025 edition of Grehlakshmi.
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