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अमेरिकी संस्थानों पर ट्रंप का निरंतर हमला

Business Standard - Hindi

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August 30, 2025

अमेरिका अपने संस्थानों पर गर्व करता रहा है लेकिन ट्रंप ने ऐसे कई संस्थानों को बरबाद किया है जो लंबे समय से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को परिभाषित करते आ रहे थे।

- मिहिर शर्मा

सं स्थान मायने रखते हैं। उन्हीं पर विकास, निवेश और आर्थिक स्थिरता की बुनियाद रखी जाती है। या फिर इसका उलटा सच है? क्या आर्थिक परिवर्तन ही आधुनिक संस्थाओं को जन्म देते हैं? अर्थशास्त्रियों ने लंबे समय से इन दोनों के बीच संबंध को समझने की कोशिश की है। पिछले वर्ष, तीन अर्थशास्त्रियों को नोबेल पुरस्कार मिला, जिन्होंने यह दर्शाया कि वे संस्थाएं जो निवेश को प्रोत्साहित करती हैं और क्षति नहीं पहुंचाती, वे दशकों ही नहीं, बल्कि सदियों तक आर्थिक वृद्धि को संभव बना सकती हैं।

हम एक बड़े प्रयोग के बीच में जी रहे हैं। इसका श्रेय अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को जाता है। उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में उन बंधनों से आजाद होने का निर्णय लिया है जिन्होंने उन्हें पहले कार्यकाल में जकड़ रखा था। उन्होंने ऐसे कई संस्थानों को बरबाद किया है जो लंबे समय से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को परिभाषित करते आ रहे थे। क्या अमेरिका आर्थिक

दृष्टि से बेहतरीन प्रदर्शन करता हुआ इससे पार पा लेगा? क्या दुनिया की सबसे मजबूत और सबसे गहरी अर्थव्यवस्था अपनी गति बरकरार रख सकेगी, वह भी तब जबकि उसकी बुनियाद को ही क्षति पहुंचाई जा रही है? इसका जवाब आने वाले दशकों में मिलेगा।

ट्रंप के राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद जिन खबरों ने अमेरिका के बाहर सबसे अधिक सुर्खियां बटोरी हैं वे उनके द्वारा दी जा रही या लागू की गई शुल्क संबंधी धमकियों से संबंधित हैं। जिन देशों पर ये शुल्क लगाए गए हैं उनमें भारत भी शामिल है। ट्रंप ऐसा करने के क्रम में संवैधानिक सीमा को पार कर गए हैं। अमेरिका की जांच और निगरानी व्यवस्था राष्ट्रपति को व्यापार नीति बनाने का काम नहीं सौंपती। यह विधायिका यानी अमेरिकी कांग्रेस का काम है। इस दायित्व को खुद संभालना और इस प्रकार शुल्क आरोपित करना तथा संबंधित कानूनों को ही नए सिरे से लिखना राष्ट्रपति द्वारा शक्तियों के बंटवारे पर चोट भी है। आखिर इस बात की बहुत कम

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