Denemek ALTIN - Özgür
हम कौन थे और क्या हो गए
Jansatta
|July 13, 2025
अखबार में लिखे हजार शब्दों और टीवी चैनलों पर बहस में बोले गए उतने ही शब्दों में क्या अंतर है? इस प्रश्न का उत्तर समकालीन भारत के विमर्श की दुनिया का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने लाता है।
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लेख लिखते समय लेखक तर्क गढ़ने में मस्तिष्क का उच्चतम उपयोग करता है। छपने से पूर्व उसे मर्यादा, सभ्यता, तथ्य और तर्क जैसे मानकों पर परखा जाता है। उधर, टीवी चैनलों पर बहस में मर्यादा, निष्पक्षता, तथ्य और तर्क की अवहेलना मानो अनिवार्य हो गया है। परंतु बात यही तक सीमित नहीं है। स्टूडियो में हाथापाई, गाली-गलौज, अभद्र भाव-भंगिमा सामान्य बात हो गई है। सोचने का स्तर निम्नतम होता है। यहां वाणी और विवेक के बीच संबंध विच्छेद रहता है। यही मुख्यधारा है। टीवी चैनलों के जो प्रस्तोता इस कायदे से दूर रहते या रहना चाहते हैं, वे कम काबिल माने जा रहे हैं।
बहस के प्रायोजक इसका औचित्य लोगों की 'रुचि' में ढूंढ़ते हैं। वे बौद्धिक और नैतिक गिरावट के लिए इस प्रश्न का सहारा लेते हैं : 'लोग क्या देखना चाहते हैं?' यह प्रपंच के सिवाय कुछ नहीं है। इतिहास साक्षी है, लोग सकारात्मकता के सारथी होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो वे फिल्मों में नायकों के जगह खलनायकों के दीवाने होते । फिल्मों के लेखक-निर्देशक और निर्माता सकारात्मकता का पक्ष तैयार करते हैं। लोगों के मन को ढालना उस काल के बौद्धिकों पर निर्भर रहता है।
सोलह नवंबर 1869 को काशी में स्वामी दयानंद सरस्वती और पंडितों के बीच मूर्ति पूजा पर शास्त्रार्थ हुआ। उसकी गंभीरता और उसके विषय की संवेदनशीलता का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि उस समय वहां हजारों लोग उपस्थित थे। यों संख्या का अनुमान दस हजार से पचास हजार तक का है। दो सौ साल पहले इतनी बड़ी संख्या में सामान्य लोग गाली-गलौज नहीं, गंभीर विमर्श सुनने आए थे। यह उदाहरण उपरोक्त प्रश्न का अपने आप में समाधान है।
Bu hikaye Jansatta dergisinin July 13, 2025 baskısından alınmıştır.
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