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महिलाओं-नीतीश की साझा समझ

Dainik Jagran

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November 17, 2025

हाल में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे हर तरह से अप्रत्याशित हैं। चुनावी विश्लेषण में यह समझना होगा कि राजग को यह जीत कैसे मिली। बिहार की राजनीतिक बनावट को समझने वाले यह जानते हैं कि बिहार का भूखंड विभिन्न क्षेत्रों में बंटा हुआ है। सबसे बड़ी विभाजन रेखा गंगा नदी है। इस पर राजनीति खास कर केंद्रीय और दक्षिण बिहार की राजनीति का कोई मेल उत्तर बिहार से नहीं है। भाषाई विविधता भी है, कहीं मगही, कहीं भोजपुरी तो कहीं मैथिली। अलग-अलग इलाकों में अलगअलग जातियों का वर्चस्व है और अलग किस्म की राजनीति भी है। तो ऐसा क्या हुआ विविधता से भरे बिहार में हमें एकपक्षीय नतीजा देखने को मिला। ऐसी क्या बात है कि दो दशक तक राज करने के बावजूद नीतीश कुमार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान देखने को नहीं मिला। राजनीतिक विश्लेषक अब यह भी समझना चाहते हैं कि प्रो इनकंबेंसी बनती है तो कैसे। इस तरह के चुनाव नतीजों के पीछे महिला मतदाताओं का एकजुट होना बहुत महत्व रखता है। चुनाव में न सिर्फ महिला मतदाताओं ने रिकार्ड संख्या में वोट डाला बल्कि समझी जाने वाली बात यह है कि 2.47 करोड़ महिलाएं वोट देने आईं। यह संख्या पुरुषों से ज्यादा थी। आलोचकों ने यह भी कहा महिलाओं को चुनाव से ठीक पहले 10,000 रुपये का

- मनीषा प्रियम राजनीतिक विश्लेषक

युगल किशोर राही प्रलोभन देकर रिझाया गया लेकिन गहन विश्लेषण के बाद एक अच्छी समझ उभरती है वह यह है कि नीतीश कुमार की सरकार ने चुपचाप काफी लंबे समय से लड़कियों और महिलाओं को ग्रामीण बिहार में समाज के हाशिए से उठा कर मुख्यधारा में लाने का काम किया और यह सब राजनीतिक दावेदारी के बिना किया गया। 2005 में जब नीतीश कुमार एक स्थिर सरकार के मुख्यमंत्री बने, उसी समय उन्होंने यह समझा कि दुनिया में सबसे ज्यादा बच्चे अगर कहीं स्कूल से बाहर हैं तो वह बिहार है। इनमें सबसे ज्यादा पिछड़ी जाति के बच्चे और बच्चियां हैं। इन सब की समग्र समझदारी प्राप्त करने के लिए उन्होंने अधिकारियों की टीम को आंध्र प्रदेश भेजा। स्वर्गीय मदन मोहन झा बिहार के शिक्षा सचिव थे। आंध प्रदेश में रेजिडेंशियल ब्रिज कोर्स देखने के बाद यह समझ बनी कि बच्चियों को विशेष रूप से स्कूल की मुख्यधारा में लाना चाहिए। सकता। उन्होंने सरकार पर यह भार सौंपा कि ब्लाक स्तर पर शिक्षा की जो व्यवस्था थी वह ग

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