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गण संस्कृति-यज्ञ संस्कृति
Kendra Bharati - केन्द्र भारती
|January 2023
“हम भारतवासी, पूरी गम्भीरता से भारत को एक सार्वभौम, लोकतान्त्रिक गणराज्य के रूप में संगठित करने का संकल्प करते है।" भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना की यह प्रारम्भिक पंक्तियाँ हैं।
वर्ष १६७५ में पूरे देश में आपातकाल थोपकर संविधान की हत्या करनेवाले ४२वें संविधान संशोधन में इसमें सार्वभौम के बाद पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी ये दो विशेषण और जोड़े गए। संविधान की मूल प्रकृति तथा प्रावधान में किसी भी प्रकार के संशोधन के बिना ही उसके उद्देश्य में दो अनावश्यक संकल्पनाओं की पूछ जोड़ दी गई । चुनावी मजबूरियों के नाम पर इन को पुनः संशोधित करने का साहस कोई भी राजनीतिक दल आजतक नहीं दिखा पा रहा है। आपातकाल के बाद स्थापित जनता सरकार ने ४४वें संविधान संशोधन से ४२वें संशोधन द्वारा जनता मौलिक अधिकारों को स्थगित करनेवाले सभी प्रावधानों को तो निरस्त कर पूर्ववत् कर दिया किन्तु प्रस्तावना में की गई छेड़छाड़ को वैसे ही रखा। इन विशेषणों के जुड़ने के कारण ही आज हम राजनीतिक दलों को तुष्टिकरण की नित नई सीमाओं को लांघते हुए देखते हैं।
इन विषयों पर चिन्तन करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि इन बातों से गणतन्त्र की नींव पर ही आघात हो रहे हैं। गणराज्य का आधार है गण। गण अर्थात एकमन से कार्य करनेवाला समूह। प्रबन्धन के क्षेत्र में आजकल अत्यधिक प्रचलित अंग्रेजी शब्द है- टीम। इसकी परिभाषा की जाती है, “एक कार्य के लिए गठित, एक लक्ष्यगामी दल”। यह तात्कालिक होता है कार्य की अवधि तक के लिए, कार्य की पूर्णता का लक्ष्य लेकर यह कार्य करता है। 'गण' की संकल्पना अधिक गहरी है। अंग्रेजी में उपयुक्त Republic शब्द से भी बहुत गहरी। गण एक पारम्पारिक पारिभाषिक शब्द है। इसके राजनीति शास्त्र के उपयोग से भी पूर्व इसका आध्यात्मिक प्रयोग है। हमारी परम्परा में पूजा का पहला अधिकार गणेशजी का है जो गणों के ईश, गणनायक हैं। केवल शिवजी के गणों का नायक होने के कारण ही वे गण-पति नहीं है। मानव का मानव से सम्बन्ध स्थापित करने की वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया 'गण' के वे अधिपति हैं। 'मैं' से 'हम' की ओर जाने की प्रक्रिया है गण। और इस प्रक्रिया के लिए आवश्यक साधना के अधिपति हैं गणपति।
This story is from the January 2023 edition of Kendra Bharati - केन्द्र भारती.
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