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उत्तर दिशा का महत्त्व और उसके गुण-दोष
Jyotish Sagar
|February 2025
उत्तर दिशा के ऊँचा होने या उत्तर दिशा में किसी भी प्रकार का वजन होने पर अथवा वहाँ पर पृथ्वी तत्त्व आने पर जलतत्त्व की खराबी हो जाती है।
उत्तर दिशा के महत्त्व को हम इस बात से ही समझ सकते हैं कि ऊर्जा का जो प्रवाह होता है, वह दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर होता है। हम वास्तु के 45 देवताओं और का अध्ययन करते हैं, तो विज्ञान की दृष्टि से वह 45 देवता ही 45 ऊर्जाएँ होती हैं।
उत्तर दिशा की ऊर्जा इतनी अधिक प्रभावी होती है, कि कम्पास की सुई उत्तर दिशा में ही स्थिर होती है। उत्तर दिशा की एक और भी महत्त्वपूर्ण बात देखने को मिलती है कि दिशाओं नाम अर्थात् उत्तर जोन का विभाजन उत्तर से ही शुरू होता है जैसे NNE, NE, NW, NNWI इसी प्रकार दक्षिण दिशा में भी दिशाओं के नाम शुरू होते हैं जैसे SSE, SE, SW, ASSW आदि।
वास्तुशास्त्र में जो सर्वोत्तम द्वार (प्रवेशद्वार अथवा एंट्री) मानी जाता है, वह होता है उत्तर दिशा का भल्लाट का पद, क्योंकि यदि आपके घर का मुख्यद्वार भल्लाट के स्थान पर होता है, तो उस घर में कभी भी पैसे की कमी नहीं होती है और हमेशा घर में पैसे का आना किसी न किसी आय स्रोत के द्वारा बना ही रहता है।
उत्तर दिशा में कुछ बातों का ध्यान देना भी बहुत जरूरी होता है, क्योंकि उत्तर दिशा की खराबी कई परेशानियों को लेकर भी आती है, जैसे टीबी, बीपी, शुगर, कैंसर। ऐसे में आपको घर में ध्यान देना होगा कि आपके घर के टॉयलेट, सीढ़ी अथवा किचन कहीं गलत दिशा में तो नहीं हैं।
उत्तर दिशा को जलतत्त्व की दिशा कहते हैं और इस दिशा के देवता चन्द्रमा हैं।
इसलिए इस बात का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए, कि इस दिशा में कभी भी काला अथवा नीला रंग नहीं करें, क्योंकि ऐसा करने पर चन्द्रमा आपको विपरीत (उल्टे) परिणाम देना शुरू कर देगा। काला एवं नीले रंग का सम्बन्ध राहु एवं केतु से होता है और राहु तथा केतु चन्द्रमा को प्रभावित करते हैं। ऐसे में आपको मनोरोग, तनाव, नींद नहीं आना और डिप्रेशन जैसे परेशानियों का सामना भी करना पड़ सकता है।
This story is from the February 2025 edition of Jyotish Sagar.
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