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बिजली क्षेत्र के लिए जीएसटी जैसा मॉडल
Business Standard - Hindi
|October 24, 2025
बिजली से जुड़े कानून में महत्त्वाकांक्षी बदलावों को लागू करना है तो यह काम विद्युत परिषद के वादे के साथ आसान हो सकता है। विस्तार से बता रहे हैं एके भट्टाचार्य
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क्या यह भारत के संकटग्रस्त विद्युत वितरण क्षेत्र के लिए जश्न का समय है ?
इस महीने के आरंभ में केंद्र सरकार ने विद्युत अधिनियम, 2003 के लिए प्रस्तावित संशोधन जारी किए। बिजली वितरण क्षेत्र के विधायी ढांचे में बदलाव के लिए आधिकारिक कारण यह बताया गया है कि यह क्षेत्र भारी घाटे से जूझ रहा है और नियामकीय देरी इसकी वित्तीय हालत को और खस्ता कर रही हैं। शुल्कों के क्रॉस सब्सिडीकरण (यानी किसी एक वर्ग से ज्यादा शुल्क लेकर दूसरे वर्ग पर कम शुल्क लगाना) के कारण उद्योगों पर उच्च शुल्क लगाया जाता है जिससे औद्योगिक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है और आर्थिक वृद्धि में अड़चन आती है।
ऐसे में केंद्रीय विद्युत मंत्रालय ने 9 अक्टूबर को मसौदा विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025 को हितधारकों के समक्ष पेश किया और उनसे सार्वजनिक टिप्पणियां और सुझाव आमंत्रित किए। आश्चर्य नहीं कि उद्योग जगत के अधिकांश लोगों, विशेषज्ञों और टीकाकारों ने भी इसका स्वागत किया। प्रस्तावित बदलावों पर करीबी नजर डालें तो पता चलेगा कि बिजली वितरण सुधारों के घोषित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सरकार को क्या कुछ करना होगा।
वितरण कंपनियों द्वारा शुल्क वसूली से जुड़े पहले प्रस्ताव को लेते हैं। कागज पर देखें तो 32 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में काम कर रही 63 बिजली वितरण कंपनियों का औसत शुल्क संग्रह 96-97 फीसदी था। समेकित स्तर पर शायद यह आंकड़ा बहुत चिंताजनक नहीं लगे लेकिन मार्च 2024 तक इस क्षेत्र पर करीब 7.53 लाख करोड़ रुपये का कुल कर्ज था और करीब 6.3 लाख करोड़ रुपये का घाटा दर्ज हो चुका था। असल समस्या यह है कि वितरण एजेंसियों की प्राप्तियां उस स्तर से काफी कम हैं जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी, अगर नियामकों ने समय पर टैरिफ संशोधन के आदेश जारी किए होते। इन संशोधनों के अभाव में बिल संग्रहण की अच्छी दर भी अधिकांश वितरण एजेंसियों के लिए अधिक गंभीर वित्तीय चुनौती को छुपा जाती है।
This story is from the October 24, 2025 edition of Business Standard - Hindi.
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