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अमेरिका बनाम चीनः भारत का अधिक दांव वाला व्यापारिक सफर

Business Standard - Hindi

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May 12, 2025

कई टिप्पणीकारों ने इस बात को तवज्जो दी है कि अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध से भारत के विनिर्माण क्षेत्र को फायदा हो सकता है। लेकिन इस पर कम चर्चा होती है कि इस अवसर का लाभ हासिल करने के लिए भारतीय नीति निर्माताओं को बेहद चुनौतीपूर्ण राह तय करनी होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका और चीन दोनों ही इन दिनों 'दुश्मन का दोस्त भी दुश्मन' मानने वाले सिद्धांत का पालन कर रहे हैं।

अमेरिका बनाम चीनः भारत का अधिक दांव वाला व्यापारिक सफर

अमेरिका एक ऐसा व्यापारिक साझेदार चाहता है जो उन वस्तुओं की आपूर्ति कर सकें जो पहले चीन से आती थीं। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि वह 'सामान के मूल देश' की बहुत बारीकी से जांच करेगा। अमेरिका नहीं चाहता कि चीन में पूरी तरह से या ज्यादातर बने सामान किसी अन्य देश के माध्यम से अमेरिका के बाजार में अप्रत्यक्ष तरीके से प्रवेश करें। यानी आदर्श स्थिति में अमेरिका यह चाहता है कि उसके व्यापारिक साझेदार चीन के साथ अपना व्यापार करना पूरी तरह से बंद कर दें।

वहीं दूसरी ओर चीन भी उतना ही स्पष्ट है कि वह महत्त्वपूर्ण सामग्री और अन्य सामान की आपूर्ति रोककर अमेरिका को घुटनों पर लाना चाहता है। दुर्लभ तत्व ऐसा ही एक उदाहरण हैं। चीन का इरादा किसी ऐसे अन्य देश को दुर्लभ तत्त्वों की बिक्री न करने का है जहां से इन सामग्रियों का उपयोग करके तैयार किए गए सामान अमेरिका भेजे जा सकते हैं।

खबरों के मुताबिक, उसने पहले ही दक्षिण कोरिया से कहा है कि वह अमेरिकी रक्षा फर्मों को दुर्लभ तत्वों से बने उत्पाद न दे। वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर अपने प्रभुत्व वाले कई क्षेत्रों में विनिर्माण प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता से उन देशों को वंचित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो इन्हें अमेरिका को बेच सकते हैं।

दूसरी ओर भारत, अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के लिए इच्छुक है। भारत के लिए अमेरिका जैसे बड़े उपभोक्ता बाजार को छोड़ देना समझदारी नहीं है। वास्तव में, अमेरिका कुछ उन देशों में से एक है जिनके साथ भारत का व्यापार संतुलन अनुकूल है। दूसरी तरफ स्थिति यह है कि भू-राजनीतिक मोर्चे पर चीन के साथ अपने अच्छे अनुभव न होने के बावजूद, भारत निकट भविष्य में आयात के मामले में उस पर अपनी निर्भरता कम नहीं कर सकता है।

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