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पराया बनाने का दर्द
Outlook Hindi
|February 02, 2026
एंजेल चकमा की मौत और छठी अनुसूची वाले कार्बी आंगलोंग में कार्बी समुदाय को 'चीन वापस जाओ' के नारे से पैदा हुए नए नैरेटिव से नागरिकता संकट के नए आयाम पर रोशनी
असम के कार्बी आंगलोंग में हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कुछ लोग स्थानीय कार्बी समुदाय के युवाओं पर चीखते-चिल्लाते दिखते हैं, “चीन वापस जाओ।” इस घटना के बमुश्किल चंद दिन बाद धुर उत्तर के देहरादून में त्रिपुरा के एक छात्र एंजेल चकमा पर नस्लीय छींटाकशी के बाद हमला किया गया। चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई। बताया जाता है कि हमले के दौरान वह बोलता रहा कि वह चीनी नहीं, भारतीय है। लेकिन हमलावरों ने उसकी एक नहीं सुनी। दिल्ली विश्वविद्यालय में पूर्वोत्तर छात्र सोसायटी (एनईएसएसडीयू) के एक सदस्य ने कहा, “पूर्वोत्तर के लोगों को हमेशा सफाई देनी पड़ती है।”
कार्बी आंगलोंग की वारदात आपसी झगड़े का नतीजा बताया जा रहा है, तो देहरादून की घटना को नस्लीय हिंसा कहा जा रहा है। लेकिन दोनों को जोड़कर देखें, तो ज्यादा परेशान करने वाली बात यही है कि पूर्वोत्तर में अपनेपन की भावना कमजोर हो गई है। अपने इलाके के बाहर वहां के लोगों को शक की नजर से देखा जाता है। वारदात अलग-अलग हैं, लेकिन वजहें एक जैसी हैं। ये शक-शुबहे समय के साथ बढ़ते जा रहे हैं।
कार्बी आंगलोंग में कार्बी लोगों को ‘चीनी’ कहना मामूली अपमान या गुस्से में कही गई हल्की-फुल्की बात नहीं है। इसका गहरा राजनैतिक नतीजा होता है, जो मूल निवासी होने के ऐतिहासिक आधार को खत्म कर देता है और उसे संदिग्ध बना देता है। यह बताता है कि पूर्वजों की मौजूदगी को आबादी में हेरफेर से नकारा जा सकता है और पहचान तभी तक बनी रहती है जब तक उसे ज्यादा जोरदार ढंग से बहुसंख्यक आबादी आक्रामक चुनौती न दे।
यह इत्तेफाक नहीं है कि ऐसी बातें खुलेआम छठी अनुसूची वाले इलाके में कहने के मायने यह हैं कि यह अनुसूची खास तौर पर मूल निवासी होने के रोज के रोज विवादों को दूर करने के लिए लगाई गई थी, ताकि जमीन, प्रशासन और सांस्कृतिक अधिकार को संख्याबल या ऊंची आवाज में बेतुके आरोपों से बचाया जा सके। लेकिन उसका मकसद कभी भी सिर्फ प्रतीकात्मक या महज औपचारिक पहचान नहीं था। इसका मकसद अपनेपन को मजबूत करना था।
This story is from the February 02, 2026 edition of Outlook Hindi.
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