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बीस साल बाद संगम
Outlook Hindi
|August 04, 2025
ठाकरे बंधु आखिर एक मंच पर क्यों आए? क्या महज मराठी भाषा ही साझा मकसद है या आसन्न बृहन्मुंबई नगर निगम चुनाव में पैठ बढ़ाने का यह बहाना है? क्या यह टिकाऊ है या बस अपनी चुनावी ताकत वापस पाने भर का मामला
महाराष्ट्र या कहें मराठी राजनीति में एक नया घटनाक्रम 5 जुलाई को मुंबई के एनएससीआइ मैदान में देखा गया, जहां बाला साहेब ठाकरे की राजनीति की विरासत के झंडे तले बीस बरस बाद चचेरे भाई उद्धव और राज ठाकरे विशाल भीड़ के सामने मंच पर आए। प्रत्यक्ष मौका तो राज्य में प्राथमिक विद्यालयों में विवादास्पद त्रि-भाषा नीति को वापस लेने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले का जश्न मनाने का था।
इस कदम को राज्य में हिंदी थोपे जाने की तरह देखा जा रहा था। मुंबई के वर्ली में इस 'विजय' रैली में उद्धव ने इशारा किया कि आगामी नगर निगम चुनाव साथ मिलकर लड़ा जा सकता है। भारी भीड़ के बीच उद्धव ने कहा, “हम साथ रहने के लिए साथ आए हैं। हम मिलकर मुंबई नगर निगम और महाराष्ट्र में सत्ता हासिल करेंगे। हमारी ताकत हमारी एकता में होनी चाहिए। जब भी कोई संकट आता है तो हम एक साथ आ जाते हैं।”
उद्धव शिवसेना संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के पुत्र हैं और राज उनके भाई श्रीकांत ठाकरे के पुत्र हैं। ये दोनों आखिरी बार 2005 में मालवण विधानसभा सीट के लिए प्रचार के लिए एक मंच पर थे। उसके बाद दोनों के बीच मतभेद शिवसेना में बाला साहेब ठाकरे की विरासत को लेकर हुआ था। झगड़ा इतना बढ़ा कि 2005 में ही राज ठाकरे को पार्टी छोड़नी पड़ी। उन्होंने 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थापना की और तब से दोनों पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ती रही हैं। लेकिन बीस साल बाद वे प्रत्यक्ष तौर पर महाराष्ट्र की भाषाई पहचान के मुद्दे के लिए एकजुट हुए हैं। लेकिन संकेत है कि वे आसन्न बृहन्मुंबई नगर निगम और महाराष्ट्र में अन्य चुनाव मिलकर लड़ सकते हैं।
महाराष्ट्र के राजनैतिक परिदृश्य में ठाकरे परिवार की लंबी विरासत है। यह विरासत केशव ठाकरे से जुड़ी है, जिन्हें प्रबोधनकर ठाकरे के नाम से जाना जाता है। वे संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के प्रमुख नेता थे, जिसके कारण भाषाई आधार पर राज्य का निर्माण हुआ। दोनों भाइयों को विरासत तो जोड़ती है, लेकिन दोनों की सियासत अलग-अलग है।
This story is from the August 04, 2025 edition of Outlook Hindi.
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