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जड़ों से जुड़कर आसान होगी राह
Jansatta
|January 08, 2026
विकसित भारत की लक्ष्य-साधना निश्चित रूप से देश के हर नागरिक को प्रोत्साहित करेगी। इसमें समाज तथा शिक्षा संस्थानों का योगदान सर्वोपरि होगा। मगर वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में हमारी शिक्षा व्यवस्था का पुनः विश्लेषण करना जरूरी है।
विकसित भारत की लक्ष्य-साधना निश्चित रूप से देश के हर नागरिक को प्रोत्साहित करेगी। आज के वैश्विक अस्थिरता के माहौल में ऐसा कौन होगा, जो भारत को विकसित होते न देखना चाहे! भारत के संविधान निर्माताओं ने उस समय चौदह साल तक के हर बच्चे को अगले दस वर्षों में अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया था। वे सभी देश की सामर्थ्य की वास्तविकता से अवगत थे, मगर यह भी जानते थे कि बड़े लक्ष्य जो प्रेरणा देते हैं, वे बहुत दूर तक ले जाते हैं। समय ने इसे सिद्ध किया है, हालांकि लक्ष्य अभी भी कहीं न कहीं अपनी दूरी दर्शाता है। लक्ष्य-साधना की सफलता के लिए यह मानकर ही चलना होगा कि इसके लिए सार्वभौमिक स्तर पर देश के प्रत्येक नागरिक का योगदान आवश्यक होगा। जो कमी दिखेगी, उस पर भी सामाजिक सद्भाव और पंथिक समरसता को और अधिक सशक्त बनाकर सफलता के द्वार खोले जा सकते हैं। अतः इन दोनों पक्षों को सरकारी प्रयासों में भी प्रमुखता देनी होगी, लेकिन उसके लिए समाज तथा शिक्षा संस्थानों का योगदान सर्वोपरि होगा।
भारत में अधिकांश अध्यापक बहु-जातीय और बहु-पंथिक कक्षाओं में पढ़ाते हैं तथा वे स्वयं भी ऐसी ही कक्षाओं में पढ़कर आए होते हैं। विविधता को साझा करने का ऐसा संजोग शायद ही कहीं और इतनी प्रचुरता से मिलता होगा ! भारत की प्राचीन ज्ञानार्जन परंपरा की गहराई, सूक्ष्मता और वैश्विकता में निहित 'सर्वभूत हिते रतः' की भावना का सम्मान भी सर्वत्र होता है। जहां पूर्वाग्रह बौद्धिकता को ढ़क लेते हैं, वहां ऐसा नहीं हो पाता है। विश्व में हर प्रकार की विविधता के सम्मान की जो व्यावहारिक अवधारणा भारत में पनपी है, और जो आज भी जीवंत है, वैसी अन्य कहीं नहीं मिलेगी। स्वतंत्रता आंदोलन में देश ने अच्छी तरह समझ लिया था कि भारतीयों को बांटने, और अंततः देश का विभाजन करने में ब्रिटिश शासन ने कैसे-कैसे हथकंडे अपनाए थे। सबसे सशक्त साधन तो उनको 1835 में थामस बैबिंगटन मैकाले ने प्रदान किया था। उन्होंने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य को बनाए रखने के लिए जो योजन बनाई, उसका लक्ष्य उनके लिए पूरी तरह स्पष्ट थाः 'हमें ऐसे लोग तैयार करने हैं, जो खून और रंग में भारतीय होंगे, मगर रुचि, राय, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज होंगे।'
Denne historien er fra January 08, 2026-utgaven av Jansatta.
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