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जरूरत होगी तो देश को जरूर मिलेगा एक और टीएन शेषन
Jansatta
|August 31, 2025
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का कहना है कि किसी भी संस्था के लिए पारदर्शिता अपने आप में कई समस्याओं का समाधान है।
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पारदर्शिता में कमी दिखते ही आप पर सवाल उठते हैं। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की कवायद के दौरान चुनाव आयोग को लेकर उठे विवाद पर उन्होंने कहा कि मूल समस्या की जड़ में चुनाव आयोग के द्वारा नागरिकता की अवधारणा को ले आना है। लवासा का कहना है कि एक दफ्तरी प्रक्रिया से जब किसी के संवैधानिक अधिकारों पर खतरा पैदा होता दिखा तो लोगों के बीच आशंकाओं ने जन्म लिया। बिहार में चुनाव नजदीक नहीं होते तो वहां के भी नागरिकों में इस तरह का डर पैदा नहीं होता। अशोक लवासा के साथ कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की बातचीत के चुनिंदा अंश।
• चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के आप हिस्सा रहे हैं। बिहार में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के शुरू होते ही एक सियासी हंगामा मच गया। सबसे ज्यादा सवाल समय को लेकर हुए। विशेष गहन पुनरीक्षण के शाब्दिक अर्थ पर जोर देते हुए मेरा सवाल है कि क्या बिहार में इसके लिए पर्याप्त समय था ?
•• समय पर्याप्त था या नहीं, इसका निष्कर्ष निकाला जा सकता है। अगर 2003 में बिहार में हुई पिछली गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को देखें तो उसके आधिकारिक आंकड़े सार्वजनिक मंचों पर नहीं हैं। इसलिए इसकी तुलना करना थोड़ा मुश्किल है। हालांकि पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछली बार साढ़े आठ महीने दिए गए थे और इस बार शायद साढ़े तीन महीने दिए गए हैं। हालांकि अलग-अलग चरणों पर गणना प्रपत्र जमा करवाने का समय उतना ही दिया गया है जो नियमों में उद्धृत है। कुल मिलाकर जो आपत्ति निवारण का समय है उसे भी देखना होगा। तयशुदा समय में आपकी आपत्तियां दूर हो सकती हैं या नहीं? यह सवाल इस संदर्भ में अहमियत रखता है कि बिहार में चुनाव होने वाले हैं। पिछले गहन पुनरीक्षण के समय में आम चुनाव भी एक साल बाद होने वाले थे। और बिहार विधानसभा चुनाव तो दो साल बाद यानी 2005 में होने वाले थे। बाकी प्रदेशों में जहां ये लागू होने वाला है वहां इस तरह की दहशत या हंगामा नहीं है कि कोई नागरिक सोचे कि मेरे वोट का अधिकार छिन जाएगा या मैं वोट नहीं डाल पाऊंगा। चुनाव आयोग अपनी आम प्रक्रिया से भी काम कर सकता था जिसमें नाम काटे भी जा सकते हैं, नाम जोड़े भी जा सकते हैं और त्रुटियों को भी ठीक कर सकते हैं।
Esta historia es de la edición August 31, 2025 de Jansatta.
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