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अन्न बल से बड़ा इसकी निंदा न करें!

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October 2022

संकल्प मन से बड़ा है। चित्त संकल्प से बड़ा है। ध्यान चित्त से बड़ा है। ध्यान से विज्ञान बड़ा है। विज्ञान से बल बड़ा है, लेकिन अन्न बल से बड़ा है। अन्न की महिमा बताते हैं, दस दिन भोजन न करें। जीवित भले ही रहे तो भी वह अद्रष्टा, अश्रोता, अबोद्धा अकर्ता अविज्ञाता हो जाता है। अन्न की है प्राप्ति हो जाने पर वह द्रष्टा, श्रोता, बोद्धा कर्ता विज्ञाता हो जाता है।

- हृदयनारायण दीक्षित

अन्न बल से बड़ा इसकी निंदा न करें!

भारतीय दर्शन का उद्देश्य लोकमंगल है। कुछ विद्वान भारतीय चिंतन पर भाववादी होने का आरोप लगाते हैं। ये ऋग्वेद में वर्णित कृषि व्यवस्था पर ध्यान नहीं देते। अन्न का सम्मानजनक उल्लेख ऋग्वेद में है, अथर्ववेद में है। उपनिषद् दर्शन ग्रन्थ हैं। उपनिषदों में अन्न की महिमा है। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहते हैं, 'अन्नं बहुकुर्वीत- खूब अन्न पैदा करो।' निर्देश है, 'अन्नं न निन्दियात-अन्न की निंदा न करें।' छान्दोग्य उपनिषद् में व्यथित नारद को सनत् कुमार ने बताया, 'वाणी नाम धारण करती है, वाणी नाम से बड़ी है, वाणी से मन बड़ा है। संकल्प मन से बड़ा है। चित्त संकल्प से बड़ा है। ध्यान चित्त से बड़ा है। ध्यान से विज्ञान बड़ा है। विज्ञान से बल बड़ा है, लेकिन अन्न बल से बड़ा है।' अन्न की महिमा बताते हैं, 'दस दिन भोजन न करें। जीवित भले ही रहे तो भी वह अद्रष्टा, अश्रोता, अबोद्धा अकर्ता अविज्ञाता हो जाता है। अन्न की प्राप्ति हो जाने पर वह द्रष्टा, श्रोता, बोद्धा कर्ता विज्ञाता हो जाता है। वाणी से लेकर अन्न महिमा तक सभी सूत्र इह लौकिक हैं। 

संपूर्णता पूर्वजों की अनुभूति है लेकिन समझने के लिए विश्लेषण पद्धति का भी उपयोग है। नारद के अशांत होने के कारण हैं। संभवतः वे समग्रता में नहीं सोचते। सनत् कुमार उंगली पकड़कर उन्हें क्रमानुसार सीढ़ी पर चढ़ाते हैं। सीढ़ी चढ़ते समय हरेक अगले पायदान पर पिछड़ा पायदान छूटता जाता है। अगले क्षण पिछड़ा पैर छूटकर अगड़ा बन जाता है। बताते हैं, अन्न की अपेक्षा जल श्रेष्ठ है।

अच्छी वर्षा नहीं होती तो प्राण दुखी हो जाते हैं कि अन्न कम होगा। अंतरिक्ष, द्युलोक, पर्वत देव मनुष्य, पशु पक्षी, वनस्पति और सभी प्राणी मूर्तिमान जल हैं। यहां जल ही यत्र-तत्र सर्वत्र है। ऋग्वेद में जल को संसार की माताएं कहा गया है। 

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