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कजरी के सुरों में पावस

Aha Zindagi

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August 2025

जब धरती पर बूंदें गिरती हैं, तब मिट्टी की महक के साथ लोकमन का संगीत भी जाग उठता है।

- - विनय उपाध्याय

कजरी के सुरों में पावस

यही कजरी में ढलकर बहता है, जिसमें कभी पेंग मारते झूले होते हैं, कभी विछोह की कसक और कभी प्रेम के मीठे मान।

लोकजीवन का आईना ही तो है

मेघों का मौसम वादियों में गहराता है तो धरती से उठता सौंधा संगीत रूह में कुछ अलहदा-सी कसक लिए घुलने लगता है। कजरी-झूला की बैठकें सजती हैं तो मानो आत्मा का संगीत बजने लगता है। ढोलक और झांझ-मंजीरों की संगत में लोक गीतों के सुर परवान चढ़ते हैं। हरी-सी यादों में प्यार, मनुहार, मासूम जिदों और शिकवे-शिकायतों का दौर बनारसी कजरी में और भी गाढ़ा हो उठता है- 'सावन की ऋतु आई रे सजनियां, प्रीतम घर नहीं आए'। तहज़ीब के तरानों में तरबतर जिंदगी ऐसी ही मुस्कराती है। पावस के आसमान पर मानो सुरों का इंद्रधनुष खिल उठता है।

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