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जहां मैं खड़ा हूं

Aha Zindagi

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August 2025

हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष रामदरश मिश्र शताधिक वर्ष के हो चुके हैं। उनकी यह अनवरत यात्रा जिस जगह से आरंभ हुई थी, वह गांव अब भी उनके भीतर है। वह उनकी ठोस ज़मीन है।

- - रामदरश मिश्र जन्म

जहां मैं खड़ा हूं

उसी से उन्होंने जिजीविषा, जीवन के प्रति आस्था और मूल्य प्राप्त किए हैं। उसी गांव और ग्राम्य जीवन के यथार्थ की एक झलक, जिसमें दुश्वारियों और दुःखों के बीच जीवन का उत्सव और उल्लास भी है...

मैं पीछे मुड़कर दूर एक बालक को देख रहा हूं जो धूल में लोट-लोटकर अपने कपड़े फाड़-फाड़कर रो रहा है। उसने एक छोटा-सा, प्यारा-सा कुत्ता पाला था। घर वालों ने यह कुत्ता दूसरे गांव के एक आदमी को दे दिया। वह बालक उस कुत्ते को गोद में छिपाए भाग रहा है और उसकी गोद से उसे ज़बर्दस्ती छीनकर उस आदमी को दे दिया जाता है। वह बालक प्रतिरोध में किसी को काट लेता है, किसी पर ढेले मारता है, किसी को अनाप-शनाप बकता है, लेकिन उसका कुत्ता छीन लिया जाता है। जब कुछ नहीं होता तो अपने कपड़े चीथ-चीथकर धूल में लोट रहा है। मैं देख रहा हूं कि वह बच्चा धीरे-धीरे सरकता हुआ मेरी ही ओर आ रहा है और मुझमें समा गया है। जी हां, वह मैं ही था और अब तक वह है।

होश संभालते ही देखी जो दुनिया

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