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नमामि पुण्य-निर्झरिणी
Jyotish Sagar
|May 2023
गुप्तकालीन स्थापत्य कला में गंगा-यमुना अपने कर (हाथ) में पूर्ण कुम्भ के स्थान पर चँवर के साथ प्रदर्शित हैं। इन नदी मूर्तियों के चामरधारी मानवीय स्वरूप की कल्पना कुमारसम्भव में भी प्राप्य है।

भारत में प्रकृति के पूजन की परम्परा अति प्राचीन है। सिन्धु सभ्यता के अध्ययन से ज्ञात होता है कि तत्कालीन समय में पशु पूजा, अग्नि पूजा, सूर्य पूजा, वृक्ष पूजा और जल पूजा का प्रचलन था। इतिहासकार मार्शल के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता (मोहनजोदड़ो) का विशाल स्नानागार सार्वजनिक, धार्मिक आयोजनों के लिए रहा होगा। वैदिक संस्कृति में भी पंचतत्त्व पूजन का उल्लेख मिलता है। वैदिक संहिताआओं में भी 31 नदियों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिनमें से 25 का उल्लेख ऋग्वेद में है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख प्राप्त होता है।
रामायण एवं अन्य धार्मिक ग्रन्थों में राजा सगर से भगीरथ तक पाँच पीढ़ियों द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाने का वर्णन प्राप्त होता है। राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ की तपस्या से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण का व्याख्यान उल्लेखनीय है। धर्मशास्त्रों में गंगा को मोक्षदायिनी बताया गया है। गंगा को त्रिपथगा भी कहा गया है, क्योंकि गंगा आकाश, पाताल और पृथ्वी तीनों लोकों में प्रवाहित होती है। भारत में गंगा ही नहीं, वरन् सभी नदियाँ पूजनीय होने के साथ-साथ भारत की जीवनरेखा हैं। इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि विश्व की सभी सभ्यता नदियों के किनारे ही फली-फूलीं।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण में कहा गया है कि गंगा और यमुना नदियाँ अपने-अपने वाहनों सहित मानवीय रूप में अंकित की जानी चाहिए। गुप्तकालीन स्थापत्य कला में गंगा-यमुना अपने कर (हाथ) में पूर्ण कुम्भ के स्थान पर चँवर के साथ प्रदर्शित हैं। इन नदी मूर्तियों के चामरधारी मानवीय स्वरूप की कल्पना कुमारसम्भव में भी प्राप्य है। शास्त्रों में उल्लेख है:
सरिता सशरीरराणां वाहनानि प्रदर्शयते।
पर्णकम्भकरा: कार्यास्तथा नमितजानवः॥
This story is from the May 2023 edition of Jyotish Sagar.
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