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वैश्विक परिवेश में व्यवसाय की सुगमता
Jansatta
|January 09, 2026
देश के तेज आर्थिक विकास के लिए व्यवसाय सुगमता जरूरी है। इसलिए कारोबार शुरू करने, चलाने और बंद करने की प्रक्रियाओं को सरल और कुशल बनाया जाना चाहिए, ताकि प्रशासनिक जटिलताओं और बाधाओं को कम किया जा सके।
किसी भी देश के तेज आर्थिक विकास के लिए वहां व्यवसाय सुगमता जरूरी है। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यवसाय शुरू करने, चलाने और बंद करने की प्रक्रियाओं को सरल, कुशल तथा लागतप्रभावी बनाया जाए, ताकि नियामकीय जटिलताओं तथा प्रशासनिक बाधाओं को कम किया जा सके और निवेशकों को आकर्षित किया जा सके। साथ ही आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिले। विश्व बैंक का 'व्यवसाय सुगमता सूचकांक' देशों की व्यवसाय सुगमता को मापता है।
इसके लिए वह व्यवसाय शुरू करने, अनुमति पत्र प्राप्त करने, बिजली-पानी की सुविधा, कर भुगतान, ऋण उपलब्धता, अनुबंध लागू करने और सीमा- पार व्यापार जैसे मानकों के आधार जांच करके उन देशों को वर्गीकृत करता है। व्यवसाय सुगमता सूचकांक में भारत को इस वर्ष 190 देशों में से 63वां स्थान मिला है। पिछले वर्ष यह 77वें स्थान पर था। इस वर्ष चौदहवें स्थान के सुधार के साथ उसका स्कोर 71 हो गया है।
व्यवसाय सुगमता का उद्देश्य कारोबार के लिए पूरे जीवनकाल में नियमों, परमिट और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता तथा समय को कम करने के साथ ही अनुकूल विनियामक वातावरण बनाना है, जो संपत्ति अधिकारों को स्पष्ट करे और विवादों को सुलझाने की लागत कम करे। इसका उद्देश्य एकल इलेक्ट्रानिक मंच बनाना, कागज रहित व्यवस्था करना और डिजिटल कर प्रणाली के माध्यम से प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना है। उच्च रैंकिंग देश की छवि को सुधारती है, निवेश आकर्षित करती है और वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देती है। व्यवसाय की सुगमता वर्तमान वैश्विक परिवेश को देखते हुए बहुत जरूरी है। इसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों, नियामक संस्थाओं, व्यवसायिक संगठनों और व्यवसायियों के साझा प्रयास जरूरी हैं। देश में अधिकांश व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन कंपनी स्वरूप में होता है। इनमें भी छोटी कंपनियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यवसाय सुगमता छोटी कंपनियों के लिए और जरूरी हो जाती है, ताकि वे कम से कम कानूनी औपचारिकताओं के साथ अपना कार्य संचालन कर देश की अर्थव्यवस्था में अपना अहम योगदान कर सकें।
This story is from the January 09, 2026 edition of Jansatta.
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