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विकेंद्रित विकास की संतुलित राह
Jansatta
|November 19, 2025
लघु कंपनियों का देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि ये रोजगार सृजन, देश के आर्थिक और क्षेत्रीय विकास में अहम योगदान देती हैं। लघु उद्योगों की तरह काम कर रहीं ये कंपनियां नवोदित उद्यमियों के लिए एक प्रवेश द्वार बनाती हैं।
व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियों के संचालन में बड़ी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ छोटी कंपनियों, यानी लघु उद्योगों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। जो नवउद्यम, साझेदारी फर्म और अन्य लघु उद्यमी अपने व्यवसाय को निगमित स्वरूप में संचालित करना चाहते हैं, उनके लिए कंपनी का लघु स्वरूप काफी उपयोगी होता है। इसमें कम औपचारिकताओं को पूरा करने की जरूरत के साथ निगमित संस्था का लाभ लिया जा सकता है। कंपनी अधिनियम 2013 में लघु कंपनी की अवधारणा को भी सम्मिलित किया गया है। इस अधिनियम के अनुसार एक निजी कंपनी जिसकी चुकता अंश पूंजी 50 लाख रुपए से अधिक न हो वह इस श्रेणी की कंपनी होगी, सरकार चाहे तो चुकता अंश पूंजी के रूप में इससे अधिक राशि का निर्धारण कर सकती है, लेकिन यह राशि पांच करोड़ रुपए से अधिक नहीं होगी या वह कंपनी जिसकी साल भर में आय अपने अंतिम लाभ-हानि खाते के अनुसार दो करोड़ रुपए से अधिक न हो या ऐसी उच्च राशि जो सरकार द्वारा निर्धारित की जा सकती है, लेकिन यह 20 करोड़ रुपए से अधिक नहीं होगी, वह एक लघु कंपनी मानी जाएगी। कंपनी की सालाना कमाई का आशय किसी वित्तीय वर्ष के दौरान कंपनी द्वारा वस्तुओं की बिक्री, आपूर्ति या वितरण से या प्रदान की गई सेवाओं या दोनों से प्राप्त राशि का कुल मूल्य है।
लघु कंपनियों को कंपनी अधिनियम 2013 के अंतर्गत कई छूट और सुविधाएं मिलती हैं। जैसे कंपनियों को अपना नकद प्रवाह विवरण तैयार करने की आवश्यकता नहीं होती। इन कंपनियों को साल में चार बोर्ड बैठकों के स्थान पर केवल दो बोर्ड बैठकें बुलाने की जरूरत होती है, साथ ही कंपनी के वार्षिक रिटर्न पर कंपनी सचिव या केवल एक निदेशक के हस्ताक्षर की जरूरत रहती है। लेखा परीक्षकों को आंतरिक वित्तीय नियंत्रणों की सूचना देने की आवश्यकता नहीं होती है। इन कंपनियों के लिए लेखा परीक्षकों को अनिवार्य रूप से बार-बार बदलने का प्रावधान भी लागू नहीं होता है। छोटी कंपनियों पर अधिनियम के अंतर्गत अनुपालन में विफल रहने पर अन्य कंपनियों पर जो जुर्माना लगाया जाता है, उसकी तुलना में इन कंपनियों यानी लघु उद्योगों के लिए जुर्माने की राशि काफी कम होती है। लघु कंपनियों पर अनुपालन का बोझ कम रहता है, जिससे उनको अपने व्यवसाय के विकास पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता मिलती है।
This story is from the November 19, 2025 edition of Jansatta.
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