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क्यों चापलूसी कर रहा है एआइ
Dainik Jagran
|November 06, 2025
एक रिपोर्ट के अनुसार, एआइ माडल्स इंसानों की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक चापलूसी करते हैं। क्या सही है और क्या गलत, इसका भेद करने की जगह ये आपको उलझा भी सकते हैं। एआइ की इस साइकोफेंसी और इससे बचने के कुछ तरीकों की चर्चा कर रहे हैं ब्रह्मानंद मिश्र ...
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एआइ साइकोफेंसी
सच्चे दोस्त और चापलूस के बीच अंतर यही है कि चापलूस वह बताएगा, जो आप सुनना चाहते हैं, लेकिन दोस्त वही बताएगा, जो आपको सुनना चाहिए। एक की सलाह आसान है, पर अंततः वह हानिकारक है। वहीं दूसरे की सलाह मुश्किल तो है, पर हितकर है। आज हम हर जिज्ञासा का समाधान इंटरनेट पर खोजने के आदी हो चुके हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) ने तो इसे इतना सहज बना दिया है कि लोग नौकरी पाने, रिश्ते को सहेजने, मेडिकल सुझाव पाने के लिए भी एआइ की तरफ देखने लगे हैं। हर बात के लिए आप एआइ पर भरोसा कर रहे हैं तो ठहर कर सोचने की जरूरत है।
एक हालिया अध्ययन बताता है कि एआइ माडल इंसानों की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक साइकोफैंटिक यानी चापलूस होते हैं। यह अध्ययन 11 प्रचलित लार्ज लैंग्वेज माडल (एलएलएम) की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। इसमें एआइ के 11,500 से अधिक सुझावों में गलतियां चिह्नित की गई हैं। चैटजीपीटी और जेमिनी जैसे लोकप्रिय चैटबाट यूजर के सवालों का जवाब देते हुए खुशामदी करते हुए नजर आते हैं। एआइ विशेषज्ञों की मानें तो इससे वैज्ञानिक शोध, नवाचार, तार्किकता और विश्लेषण जैसे कार्यों में एआइ के प्रयोग पर सवाल खड़े होते हैं। एआइ का भ्रमजाल: जहां दोस्त और स्वजन आपकी बातों से मतभिन्न या नाखुश हो सकते हैं तो वहीं एआइ के जवाब आपको हमेशा आश्वस्त और सहज करने वाले दिखते हैं। इससे निर्णय लेने की क्षमता बाधित होती है और आप अनिश्चितताओं में घिरते हैं। अगर चैटबाट को गलत जानकारियां फीड करेंगे तो वह झूठी जानकारियां ही परोसेगा, उसे दोहराएगा और उसी की व्याख्या भी करेगा। यह भ्रम के जाल में ऐसे उलझा देगा कि आत्महत्या की प्रवृत्ति वाले सहायता लेने से बचने लगेंगे।
This story is from the November 06, 2025 edition of Dainik Jagran.
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