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जनता को तंग करने वाले फैसले
Dainik Jagran
|July 06, 2025
आखिर वाहनों के प्रदूषणकारी उत्सर्जन को रोकने के मामले में जो काम वाहन निर्माता कंपनियों को करना चाहिए, वह सरकार अपने हाथ में क्यों लेती है?
हाल में राजधानी में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के इस आदेश ने दिल्ली एवं एनसीआर के लाखों वाहन मालिकों के लिए परेशानी पैदा कर दी कि उम्र पूरी कर चुके अर्थात 10 वर्ष से पुराने डीजल और 15 वर्ष से पुराने पेट्रोल वाहनों को ईंधन नहीं दिया जाएगा। यह आदेश इसलिए दिया गया, क्योंकि ऐसे वाहनों को चलन से बाहर करने के उसके आदेश पर अमल नहीं किया जा रहा था। ऐसे वाहनों को पेट्रोल-डीजल न देने के फैसले से दिल्ली के कई पेट्रोल पंपों पर अफरातफरी फैल गई। एक-दो दिन के अंदर ही यह एक राजनीतिक मसला बन गया और ऐसी आवाजें भी उठीं कि उम्र पूरी कर चुके वाहनों को एकाएक ईंधन न देने का फैसला सही नहीं है। खुद दिल्ली सरकार को आगे आना पड़ा और सीएक्यूएम से कहना पड़ा कि वह अपना फैसला वापस ले। प्रदूषण रोधी निकाय सीएक्यूएम के पास पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु की गुणवत्ता के प्रबंधन का अधिकार है। पता नहीं यह निकाय किस आधार पर इस नतीजे पर पहुंच गया कि 10 वर्ष पुराने डीजल और 15 वर्ष पुराने पेट्रोल वाहनों के इंजन ऐसे हो जाते हैं कि उनका उत्सर्जन इतना बढ़ जाता है कि वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण बनता है। इस नतीजे पर पहुंचने के पहले अध्ययन एवं विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किया ही गया होगा, लेकिन शायद इसकी अनदेखी कर दी गई कि कई वाहन मालिक अपने वाहनों का कम इस्तेमाल करते हैं। अधिकतर उनका कमर्शियल इस्तेमाल भी नहीं करते। इसके चलते उनके वाहनों के इंजन इतने खराब नहीं होते कि उन्हें प्रदूषण फैलाने का दोषी मान लिया जाए। कुछ लोगों के पास तो ऐसे वाहन हैं, जो 10 साल में 50 हजार किमी भी नहीं चले होते।
This story is from the July 06, 2025 edition of Dainik Jagran.
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